Friday, December 31, 2010

एक फूल

एक फूल चुन के लाया हूँ मै दिल के गुलशन से,
पत्तिया इसकी मेरे प्यार की रंग हें मेरी धडकन के,
रस भरा इसमें जितना जितनी खुशबू  समाये,
उतनी खुशियाँ जीवन में सनम आपके आ जाये,
चाहत है यही आप सदा इसी तरहा खिले,
पल पल रहो में आपकी आशाओ के दीप जले,
ईद सा हो दिन आपका दिवाली सी रात,
मन ये देता आपको दुआओ की सोगात,
हर कामना जीवन की हो जाये आपकी पूरी,
कभी  ना रहे अपकी कोई आरजू अधूरी ,
वो मिले हर खुशी दिल आपका जिसपे मरता है
आपके लिए इतनी सी दुआ ये ‘दीपक’ करता है ,

Monday, December 27, 2010

सब ठीक है

सबसे पहले तो आपको प्रणाम और बहुत दिन तक गैर हाजिर रहने के लिए क्षमा। आज 22 दिन हो गये हमारा नेट बंद पडा है, जितने चक्कर मैने ऐक्सचेंज के लगा लिये है उतने तो शायद मजनू ने लैला के घर के भी ना लगाये हो, या फिर इतनी बार मन्दिर मे जाता तो शायद भगवान भी दर्शन दे देते। पर वाह रे BSNL तुम प्रसन्न ना हुये।


इन बाईस दिनो मे कितना तडपा हूँ बस मुझे ही पता है, बहुत गुस्सा भी आया अपने BSNL पर और अपने आप पर भी। BSNL पर तो उसकी खराब सर्विस के लिए और अपने आप पर अपनी साधन हीनता के लिए। आज के मोबाईल युग मे भी हम लैंडलाईन के चक्कर मे फंसे है लेकिन करे भी तो क्या गरीब आदमी है हमारे पास मल्टीमिडिया सेट नही है कोई भी नया मल्टीमिडिया हैंडसेट पाँच छः हजार से कम नही है और ये मेरे बजट से बाहर है।

ये ब्लोगिंग इश्क से भी खतरनाक बिमारी है ना तो आशिक को अपने महबूब को देखे बिना चैन आता है और ना ही ब्लागर को ब्लाग पढे या लिखे बगैर। इस ब्लोगिंग ने हमे मंगता तक बना दिया है जिससे बात करना पसंद ना था उससे मोबाईल मांगना पड गया और जले पर नमक ये कि लोगो ने देने से मना कर दिया। खैर इन दिनो मे अपने परायो की भी काफी पहचान हुई पचासो लोगो मे से एक दिन एक ने अपना मोबाईल दिया वो भी बस 1 घंटे के लिए बस उसी घंटे मे पोस्ट (सुधर जाओ) भी डाल दी और कई जगह टिप्पीया भी लिए।

आज एक भाई साहब अपना मोबाईल मेरी दुकान मे चार्जिंग के लिए लगा कर गये (दो दिन से गाँव मे लाईट भी नही है) तेा हमने भी मौके का फायदा उठाने की सोच ली धडाधड पोस्ट लिखमारी अपने दोस्तो को बताने के लिए कि मै कुशलपुर्वक हूँ। और जैसे ही मेरा नेट चलेगा मै आप लोगो की महफिल मे फिर से हाजरी लगाऊगा।

Wednesday, December 15, 2010

सुधर जाओ

जानता हूँ,
आपकी ही सरकार है
खानदानी लैठत हो
इस जनता पर
आपकी ही लठमार है
मानता हूँ
आपके आगे कौन बोलता है
अमीर चमचा है
गरीब तो जन्मजात गूंगा है
वो कहाँ लब खोलता है
जानते हो,
अब तुम्हारे ही राज मे,
कुछ सिरफिरे पैदा हो गये हैं
जिन्हे आता है मजा
नमक लगाने मे तुम्हारी खाज में
तुम्हारी ही सरकार के लाये कम्पयूटर को
हथिहार बना लिया है
ब्लाग बनाकर
हर सिरफिरा बोल रहा है
इस उम्मीद से
कि तुम सुधर जाओगे
(कुत्ते की पूछँ कहाँ सीधी होती है)
सुधर जाओ वर्ना
गुजर जाओगे


Monday, December 6, 2010

जूँ

जो नही नहाते
दुनिया दारी के जल मे,
इमानदारी नामक जूँ
हो जाती है उनके सर मे,
परेशान रहते हैं हाथ भी
और बाल (गोपाल) भी
जब भी करते है कोशिश
अन्य-आय की
तभी जूँ काट लेती है
हाथ कुछ लेने के ब्जाय
खुजलाने चला जाता है


जो रोज नहाते है
आल क्लीयर लगाते है
बाल भी खुश
हाथ भी खुले खुले
औरो के मन भी भाते है
(ये और बात
वो रब को मुंह न दिखा पाते है)

Wednesday, December 1, 2010

दीपक जले

दीवाली पे कितने दीपक जले
कोई ना जले ज्यो दीपक जले
हूक उठती एक मन मे
देख अन्धेरा अपने ही तले
वो ना आये देर रात तक
जिनके लिए हम शाम से जले
औरो को राह दिखा दी लेकिन
खुद रहे वही पे खडे
बाँहे पसारे खडे रहे हम
ओरों से मिले वो जा के गले
जिसको चाहा उसने ना चाहा
प्यार की और क्या सजा मिले
उसके सितम की इंतहा है ये
दीपक तरसे अपनी ही ज्योति के लिए

Sunday, November 28, 2010

एक हो जाओ फिर से

गीत प्रेम के गाओ फिर से
आओ गले लग जाओ फिर से
बहुत रह चुका विरान गुलशन
फूल बन खिल जाओ फिर से
अलग थलग बहुत हो लिये
अब तो एक हो जाओ फिर से
मेरी सुनो, मै सुनू तुम्हारी
कहानी कोई बनाओ फिर से
झगडो से मन ऊब गया है
पैगाम अमन का लाओ फिर से
नफरत की आंधी मे जो बुझ गया
दीपक वो प्यार का जलाओ फिर से

Thursday, November 25, 2010

सहायक योग्यता

ना नेता की सिफारिश
ना रिश्वत देने को पैसे
नौकरी मिले भी तो कैसे ?

सब के सब धुरन्धर है
सबके पास हैं डिग्री
सबमे है असीम प्रतिभा
और हौसला कुछ कर गुजरने का
ऊचाईया छू लेने का,
परन्तु जब,
स्थान एक अर्जी हजार
सभी योग्य
तो क्या करे अधिकारी
किस को दे नौकरी
सभी समान प्रतिभाशाली

ऐसे मे
नेता की सिफारिश या रिश्वत
एक मात्र
“सहायक योग्यता “ है
जो हमे भीड से अलग करती है
और नौकरी दिला सकती है

Saturday, November 20, 2010

दुनिया और प्रेमी

ये नही, कि विश्वास नही
स्नेह की करूण प्यास नही
मन मे प्रेम मेरे इतना
गर्भ अवनी जल जितना


ये सोच लगता है डर
निभाये हम प्रेम क्योंकर
पवित्र स्नेह नीरज खिलना
कठिन, सत्य प्रेम मिलना
हर मन ज्यो कपट बसा
दल दल लोभ मनुष्य फँसा
किस पर लगे सत की आस
कैसे मिटे ये प्रणय प्यास


मिल भी जाये जो साथी
प्रभा कोई ज्यो जगमगाती
आ जाये जीवन ज्योति बनकर
मन मे सत्य निष्ठा भरकर
स्नेह भर, अंक जलागे
मन की प्रणय तृष्णा बुझाये
बिसार कर हर मोह पाश
बाध्ँ भी दे कोई विश्वास

तो, पग मे होता आन खडा
जो, प्रेम का शत्रु बडा
कभी जाति की बेडी बनकर
कभी धर्म दीवार सा तनकर
धन कभी राह मे लाता
कभी कुल का मान दिखाता
बहुरूपिया सा, वेष बदलकर
समाज आता कई रंगो मे ढलकर

तुम ही कहो क्या बन पडे
दो दीप अन्घेरो से लडे
रात लम्बी काली बडी
विपदाये मुह बाँये खडी
पक्ष हमारा न कोई ले पाये
अपने पराये एक हो जाये
सर्घष कर बुझने के सिवा
और वो कर सकते है क्या

Thursday, November 18, 2010

आस

और कब तक
बैठी रहेगी,
यूं ही घुटनो पे रखे सर,
मुँह छुपाये,
वो ना आयेगा
जिसके लिए बैठी है बरसो से
आना होता
तो आ जाता अब तक
अब तो जाने लगा रवि भी
पर तेरी आस न गयी अब तक,
भूल जा
एक स्वप्न जानकर
उसके प्रेम को
भूल जा कोई आया था
महकाने दुनिया
रंग देने अपने रंग मे
तेरे तन मन को,
वो भंवरा था
चला गया रस पीकर
नई कली की
अधखिली की तलाश मे
उसे अटूट प्यार किया ना
पगली ने
मन क्या तन भी वार दिया
ये भी ना सेाचा
ये भी ना जाना
कल क्या होगा,
विश्वास बहुत था न उस पर
अपने प्रेम पर,
जाने क्या क्या
सपने सजाये होंगे
उसके लिए
प्यार के, घर बसाने के
उसके साथ
उसकी बातों मे आकर,
अब, टूट गया ना तेरा विश्वास
लूट गया ना वो,
तेरा तन - मन ओर सुख चैन,
सब कुछ,
और तू पगली
अब भी बैठी है
घुटनो मे मुंह छुपाये
उसे याद करके
इसी पेड के नीचे
तालाब किनारे
उसका इंतजार करती है
आंसू बहाती है
उसे याद करके
उस निर्मोही को
जिसे कद्र न हुई तेरी
तेरे प्यार की ,
चला गया
मुंह  मोड कर
तुझे छोड कर
मन को तोड कर
जब उसे नही तेा
तू क्यो करती है उसकी परवाह
और कब तक याद करेगी उसे
बोल, कुछ तो बोल
“टूटा तन टूटा मन
टूट गया विश्वास
मै रहूगी बैठी यही
जब तक न टूटेगी  आस “

Tuesday, November 16, 2010

ग़ज़ल

मन मे बाते कैसी पलने लगी
बेरूखी की हवाये चलने लगी

तेरी मेरी बात बन जाती मगर
हमे देख दुनिया जलने लगी

मेरी ही आह है ये सर्द हवाये
नमी आँखो की इनमे घुलने लगी

तेरा क्या तू बदल ले शायद
मेरी आदत कहाँ  बदलने लगी

मै तो वहीं हूँ पुल की तरह
तू ही नदी सी चलने लगी

यहाँ तेरी हसरत ने अंगडाई ली
उधर मेरी मिट्टी रूह बदलने लगी

Sunday, November 14, 2010

वो

सामने की गली के
आखरी मकान मे
वो रहती है
वो
जो चुप होकर भी सब कहती है
सब जानती है पर चुप रहती है
वो
जो समाज से डरती है
फिर भी प्यार करती है
मन मे भावनाये जगाती है
सपने देखती और
दिखाती है
उठती है उसके मन मे भी तरंगे
परन्तु वह दबा देती है
बस एक बार उठाकर
पलके झुका देती है
वो
जो चुपचाप ले लेती है
मेरे हर खत को
पर कोई उत्तर नही देती है
जाने क्या है
उसके मन मे
खत देती नही
पर ले लेती है?
वो
जो चाहती तो है
पर अपनाती नही
छुपाये रखती है बताती नही
घर  के किसी तन्हा कोने मे
आँसू छलकाती है
वो जिसे मै चाहता हूँ
जो मुझको चाहती है

Thursday, November 11, 2010

भावनाये

इस छोटे से मन मे
भावनाये अनेक बसती है
नये नये रंगो से प्रतिदिन
रंगोलिया नई सजती है
         सजते है नित सपने नये
         आशायें जन्म लेती है
         उडती प्रेमाकाश मे
         खोल परो को लेती है
नववधु बनकर मुस्काती
घुंघट खोल रिझाती है
कौन अपना कौन पराया
सब को गले लगाती है
          खिलती गुलाब सी, तुम्हे देखकर
          आँख मिले तो शर्माती है
          ये भावना है मन की
          तुम पर प्रेम लुटाती है
तुम मिलो तो आये चैन
ना मिलो तेा घबराती है
तुम्हारे वियोग के नाम से
रोती है , डर जाती है
        सब अन्त हो जाता है
        और सांसे  भी रूक जाती है
         जब कभी किसी मन की
         भावनाये बिखर जाती है

मुबारकबाद

          दोस्तो सबसे पहले तो आप मुझे मुबारकबाद दिजिए। अरे नही नही मेरी सगाई नही हुई है और ना ही मेरी नौकरी लगी है। ना ही ऐसा कुछ हुआ है जैसा कि आप सोच रहें है।
         पिछले आठ दिन से मै इस चक्कर मे लगा हुआ था, मै ही क्या सभी यार दोस्त भी, यहाँ तक की दिवाली भी इसी चक्कर मे निकल गयी। आप लोगो से  मुलाकात भी न हो पायी (पोस्ट पढकर या टिप्पणी देकर) आप भी सोच रहे होंगे की दिवाली मना रहा है या बिमार है कि कुछ पता ही नही कहाँ है, अपने ब्लाग पर भी लिखकर नही गया। इधर हम भी परेशान क्योकि आप लोगो से सम्पर्क जो नही था।
      हुआ यूँ के 3 नवम्बर की शाम को मेरे गाँव  के एक बच्चे ने रोकेट छोडा, अब आप कहेगें कि इसने कौन सी बडी बात है दिवाली पर सभी छोडते है। लेकिन उस बच्चे के राकेट का एंगेल गलत हो गया ओर वो जा चला सीधे टेलीफोन एक्सचेंज की तरफ, अब उसके पास भी एक पटाखे वाले की दुकान, राकेट सीधा पटाखो पर और फिर जो आतिश बाजी हुई उसका क्या हाल बताऊ। कुछ राकेट उडे और जा घुसे एक्सचेंज के जेनरेटेर के पास रखे डीजल के ड्रम मे, और फिर क्या था, चारो तरफ आग ही आग। पूरा गाँव आग बुझाने मे लग गया, आग तो बुझ गयी पर पूरा नेटवर्क बंद हो गया, हमारा इंटरनेट भी, अब हम परेशान की क्या करे बिना इंटरनेट के तो हम बेकार है। अगले दिन जाकर पता किया कब तक ठीक होगा तो कहा गया शाम  तक हो जाना चाहिए हम कोशिश मे लगें हैं। लेकिन शाम तक भी न हुआ, अब यार दोस्त भी परेशान, किसी का मेल आना था किसी को चैट करना था (गाँव मे मेरी ही इकलौती दुकान है जहाँ इंटरनेट की सुविधा है ) बस फिर क्या था सलाह हुई कि ऐसे तो काम न चलेगा एक्सचेंज मे जाकर ही कुछ करना पडेगा और हमारी टीम बहुच गयी एक्सचेंज। अब बी एस एन एल वालो के साथ साथ हम भी मशीनो के साथ हाथापाई करने लगे। हम मशीनो से परेशान, मशीने बी एस एन एल वालो से और बी एस एन एल वाले हम से, कई दिन की जंग के बाद आज लाईन चालू हुई।
       आज लाईन चालू होने के बाद जो खुशी हुई उसे मै ब्यान नही कर सकता। आज नेट चालू होने के बाद मै फिर से अपने उस परिवार से मिल रहा हूँ जिसकी आठ दिन से खैर खबर ही नही थी। इसलिए मुझे मुबारकबाद दिजिये कि मेरा इंटरनेट चल गया और मै अपने परिवार मे वापस आ गया।
        आज पहली बार गद्य मे कुछ लिखा है जानता हूँ बहुत सारी गल्तिया की होंगी, पर आप उन गल्तियो को नजरअंदाज कर छोटा भाई समझ कर माफ कर देना।

Wednesday, November 3, 2010

वायरस तेरे प्रेम का

जिन्दगी के कमप्यूटर मे आया जबसे, वायरस तेरे प्रेम का,
बंटाधार करके ही माना मेरे दिल के फ्रेम का,
                 छोटे छोटे सपनो की, फाईले इतनी बनाई,
                 लाख जतन करके भी, डिलिट ना हो पाई,
पापा ने भी डंडे का मुझ पर, एंटी वायरस चलाया,
पर वायरस तेरे प्यार का, कमप्यूटर से निकल ना पाया,
               उडा कर सारी खुशियो का डाटा, आप गायब हो गयी,
               आशाओ की सारी फाईले, पी.सी से गुम हो गयी,
धीरे धीरे करप्ट इसने, दिमाग की रैम कर दी,
हार्ड डिस्क की सारी मैमोरी, अपनी यादो से भर दी,
               फारमेट किया सिस्टम सारा, शायद रह गयी कुछ कमी है ?,
               क्योंकि आरजू की फाईल मे अब, पहले सा डाटा नही है,

Monday, November 1, 2010

चिंता

बैठा रहा चिंता नाग
मन पर कुण्डली मारे
डसता रहा, फन फैलाकर
बार बार मन मे भरता रहा
 बेतोड अपनी विष आग,

रक्त की बूँद बूँद मे
रम गया विष इसका
धुआ हो गया शरीर
निष्चेतन होने लगे प्राण,

चाहा कई बार
मार डालूं ये नाग
सुरा की लाठी से
परन्तु, विफल रहा
हर प्रहार से,
वो अधिक बलवान होता गया,
और अधिक विषैला हो
डसता रहा,

निकली न कोई राह
इसको मारने की और,
खत्म करने की विष का प्रभाव,
असफल रहा हर शस्त्र,

क्षत विक्षप्त मन और
जीर्ण शीर्ण तन लेकर
जीता रहा, परन्तु कब तक ?
आखिर एक दिन
आत्मा ने बदल ही लिये वस्त्र

Saturday, October 30, 2010

आज खुद पे यूँ ना शर्माया होता

आज खुद पे यूँ ना शर्माया होता
किसी का दिल जो तुने ना दुखाया होता
लौट जाने दिया उसे खाली हाथ दर से
कम से कम पानी तो पिलाया होता
चाहता तो बचा भी सकता था उसको
अपने हिस्से का निवाला उसे खिलाया होता
तेरा राज भी यूँ चर्चा ए आम न होता
किसी का राज जो तूने छूपाया होता
सरे बाजार ना लुटती इज्जत घर की
किसी बहन के काँधे  से आँचल जो ना हटाया होता
रौशनी रहती तेरे घर मे भी आज रात
किसी घर का दीपक जो ना बुझाया होता

Thursday, October 28, 2010

एक बार बस तुम आजाओ

एक बार बस तुम आजाओ
          मेरे होठो पर बन कर गीत
          इन साँसो का बन संगीत
         एक बार बस तुम छा जाओ
एक बार बस तुम आजाआ,
        हृदय मे बन प्रेम ज्वाला
        प्यासे का बन नीर प्याला
        जन्म - 2 की प्यास बुझाओ
एक बार बस तुम आजाओ
        चाह रहे ना कुछ पाने की
        इस जीवन की और मर जाने की
       जब प्रेम से अंग लगाओ
एक बार बस तुम आजाओ
       सर्द मौसम मे बनकर धूप
       चाँदनी सा लेकर रूप
       मेरी मन बगिया महकाओ
एक बार बस तुम आजाओ
       सीप का बन कर मोती
       “दीपक“ की बन कर ज्योति
       जीवन मे प्यार भर जाओ
संग तुम्हारे है कितनी बहारे
दिये तुमने ही सपने प्यारे
मुस्कान बन छाये लबो पर
आँखों  मे भर दिये हसीं नजारे
साथ यूही तुम रहो हमेशा
दूर हो के ना पल गुजारे
न किसी और की आस करू
न कोई बसे मन मे तुम्हारे
तुम्हारे लिए ही धडके ये दिल
हर धडकन तुमको ही पुकारे
आओ हम खाये ये कसम
टूटने न देंगे ख्वाब ये प्यारे

Wednesday, October 27, 2010

मेरे दोस्त
तुम बहुत सुन्दर हो
चाँद से भी ज्यादा
कोमल हो गुलाब से भी,


परन्तु क्यो स्वंय को
बनाना चाहती हो शिकार
सबकी पापी नज़रो का
ये पारदर्शी वस्त्र पहनकर
क्या दिखाना चाहती हो
अपना शरीर या आधुनिकता,


दिखाना चाहती हो
कि “मै माड्रन हूँ“
यदि हो तो
निवस्त्र  हो के दिखाओ,
या अपना शरीर
जो नुमाईश की नही
छुपाने की चीज है
यदि वो सबको दिखाना है
तो क्या आवश्यकता
इन पारदर्शी वस्त्रो की

Tuesday, October 26, 2010

उपवन से लाया हूँ सुमन
केश तेरे सजाने को
सागर से लिये हैं मोती
माला कोई बनाने को
प्रीत मे पागल बुला रहा हूँ
तारे, आचँल तेरा सजाने को
           रात की काजल लेकर मै
          नैनो मे तेरे लगाऊ
          पथ मे तेरे बिछ जायें
          मै चुन के कलिया लाऊ
          हरपल जिसको तू गुनगुनाये
         गीत मै ऐसा बनाऊ
तुम आओ प्रिय पास मेरे
प्रेम से तुम्हे बुलाता हूँ
प्रेम का अमृत दूँगा तुम्हे
शपथ प्रेम की खाता हूँ
अन्धेरो का न परिवाद करो
मै दीपक बन जल जाता हूँ

Sunday, October 24, 2010

तुम कहती थी
“प्रेम पूजा है
मन मन्दिर और
तुम देवता“
प्रतिदिन आकर
चढाती थी स्नेह सुमन
और लगाती थी टीका
माथे पर मेरे
चन्दन का नही
चुम्बन का अपने,
तुम सदा चाहती थी
लीन रहना
इस पूजा में,


तुम कहती थी
प्रेमी और पुजारी
दोनो की एक साधना है
प्रेमी आस्था रखता है
अपने प्रिय मे
पुजारी भगवान मे,
पुजारी नही रहता
बिन पूजा किये
बिन दर्शन किये
अपने देवता के
और फिर प्रेमी भी तो
चैन नही पाता
बिन प्रिय को देखे


तुम कहती थी
मै पुजारी हूँ तुम्हारी
और तुम मेरे देवता
सदा यूँ ही करूंगी
अर्चना तुम्हारी
अर्पित करती रहूँगा
प्रेम पुष्य यूँ ही सदा
तुम्हारे चरणो मे,



परन्तु अब,
पिछले कुछ दिनो से
तुम न आयी
क्या नास्तिक हो गयी हो ?
या
मन मन्दिर मे रख ली है
नई प्रतिमा कोई


तुम सच कहती थी
तुम पुजारी हो मै देवता
तुम सचमुच पुजारी थी
पुजारी छोड देता है
पूजा एक भगवान की
फिर किसी दूसरे की
तुमने भी बदल लिया
अपना देवता

सदा से पुजारी ही बदलते है
कभी देवता नही बदलते
वे वही रहते है अपने स्थान पर
स्थिर अडिग
क्योकि वे जानते है
एक दिन उनका पुजारी
अवश्य आयेगा
फिर उन्ही की शरण मे

Friday, October 22, 2010

मन्जिल ना रॊशनी

मन्जिल ना रॊशनी कोई नजर आ रही है,
जिन्दगी ये न जाने किस ओर जा रही है,
कदम कदम पे कोई सहारा ढूढता हूं मै,
हर शै है के मुझसे दूर जा रही है ,
तन्हा ही निकल पडता हूं उन राहों पे मै,
जिन राहों से अब भी तेरी खूश्बू आ रही है,
छत पर खडे होकर चांद छूने की चाह्त है,
जाने क्यों मेरे घर की दीवारे धंसती जा रही है,
दोस्ती की किताब हर पन्ना बिखरने लगा,
मुलाकातों की चादर अब सिकुडती जा रही है,
रॊशनी की है जरूरत, जलाऊ कैसे दीपक,
हर तरफ़ से आंधियों की  आवाजें आ रही है,

Wednesday, October 20, 2010

प्यार का असर

प्यार का असर अब घटने लगा है

चाहतो का बादल अब छटंने लगा है
         सिकुडने लगी मुलाकातो की चादर
         बातो का आँचल अब फटने लगा है
चलने लगी जाने कैसी हवायें
बेवक्त मौसम अब बलदने लगा है
          जिस दिल मे था कभी आशयाना मेरा
          उस मे कोई ओर अब बसने लगा है
उनकी राहो मे बिछे फूलों की खातिर
अंगारो पे ये दिल चलने लगा है
          होने वाला है अब उजाला “दीपक“
          आसमाँ का चाँद अब ढलने लगा है


Tuesday, October 19, 2010

एक बार जो तुम आ जाते

एक बार जो तुम आ जाते,

            मेरे अधरों पे बनकर गीत,
            श्वास वीणा का बन संगीत,
           मन से तुमको हम गुनगुनाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
             सिर चढाते चरणों कई धूल,
             स्वंय बन कर हम फूल,
             पथ मे तुम्हारे बिछ जाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
             चंदा बन दुनिया मे मेरी,
             ना होती ये रात अन्धेरी,
            आँसू मेरे तारे बन जाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
           कितना स्नेह कितना प्यार,
           मिलता मुझे नया संसार,
           सर्वस्व तुम पे हम वार जाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
         लाली इन कपोलों पर आती,
         मुस्कान अन्नत अधरों पे छाती,
         ह्रदय सुमन ना यूँ मुर्झाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
         सावन के झूलों पर मेरे संग,
        उपवन मे बन पुष्पों का रंग,
       बसन्त मे मेरा घर महकाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
        मरुथल मन मे बन प्रेम सागर,
      सिचते प्रेम तरू भर क्ष्रद्धा गागर,
      मेरे जीवन की प्यास बुझाते,
एक बार जो तुम आ जाते,
      बाँध लेते बाँहो के बंधन,
      कर लेते मेरा आलिंगन,
      और पलके बंद कर शर्माते,
एक बार जो तुम आ जाते,

अलग अपनी दुनिया

अलग अपनी दुनिया बसा रहा हूँ मै
तोड कर तुमसे नाता जा रहा हूँ मै
               दुख है तो बस यही तुम मुझे अपना न सके
              चाह कर भी कभी मुझे सीने से लगा न सकें
भाग्य मे जो लिखा है बस वही तो पाऊंगा
अतिथी हूँ एक रात का प्रातः चला जाऊंगा
              कल भी सुहानी प्रातः जगेगी, और चमकेगा रवि
              कल भी सजेगी सभा यहाँ पर, गीत सुनायेंगे कवि
कल भी ज्वलित दीप होगें, दर्द किसी हृदय मे पलेगा
कल भी प्रकाशित होगी सभा, पर ना ये दीपक जलेगा


Sunday, October 17, 2010

उस दिन जब मेरे चरणे में

उस दिन जब मेरे चरणे में,

प्रेम पुष्प, गये अर्पित कर,
देख तुम्हारा प्रेम और अखण्ड श्रद्धा
हूक उठी मन मे,
आयी मेरी आँखे भर,
हर्ष हुआ मन मे असीम
भाग्य पर इतरायी
परन्तु सोचा,
पुष्प ये पवित्र प्रेम के
जो तुमने किये अर्पित
बना दिया देवी, मानवी वो
योग्य हूँ क्या मै इनके,
कहाँ  ये धूल भरे पाँव
कहाँ ये पुष्प प्रेम के?
कहाँ  श्रद्धा भरा मन तुम्हारा ?
और कहाँ मेरा तन ?
पाँव स्वंय हट गये पीछे

फिर एक बार आया मन मे,
उठा लूँ ये जीवनाधार
लगा लूँ सीने से
चूमकर कर इन्हे कर लू
उद्धार इस देह का,
और झुक गयी उठाने के लिए,
परन्तु जागी चेतना मन की
“मै क्या करने जा रही थी
आज नही तो कल,
भेद अवश्य खुलेगा,
तब क्या रहेगा मान मेरा ?
क्या बचेगा शेष
प्रेम उनके मन मे ,
टूटेगा दपर्ण मन का,

“पुष्प न उठाउंगी ,
तो उनको होगा क्या संताप नही ?“

“परन्तु न होगा बढकर उससे,
तो तब होगा, जब जानेगें सत्य,
आज बिखरेगा स्वप्न केवल,
कल बिखरेगा जीवन,
ये अपराध भी क्या प्रभु क्षमा कर पायेंगे“

तब क्या करती मै
झुकी हुई थी,
समझ सकती थी
तुम्हारे मन की भावनाओ को,
उस विचार चक्र को
जो तुम्हारे मन मे चल रहा था,
तुम्हे आभास न हो मेरी स्थिति का,
मेरे मन को न तुम जान जाओं
झुकी थी पुष्प उठाने, लेकिन
बहाना कर गयी,
और करती भी क्या?

तुम्हे मुडकर देखने का
सौभाग्य प्राप्त करती लेकिन
न किया,
इससे हो सकता था
प्रकट तुम पर, प्रेम
मेरे मन का, श्रद्धा मेरे मन की,
जो चाहते हुए भी
न दे सकी, न पा सकी
और मै बस
चलती रही चलती रही

Saturday, October 16, 2010

उस दिन जब, तुम्हारे चरणो मे

उस दिन जब, तुम्हारे चरणो मे,

प्रेम पुष्प, आया अर्पित कर
धो दिये आँसुओं से पुष्पो को
देखकर सजल नेत्रो से,
डूब गयी तुम किसी सोच मे,
जाने कहाँ रह गयी खोकर,
हटा लिए, चरण पीछे फिर
उस क्षण, बंद हो गयी गति
हृदय की, और लहरे लहू की,
कितने कुविचार, खडे हो गये
घेर लिया मष्तिक को हर ओर से,
“ये पुष्प न तुम उठाओगी,
गिरा दोगी महल प्रेम का
विश्वास की नीव पर
श्रद्धा स्तम्भ पर, जो बनाया है,
कर दोगी चूर स्वप्न सलोना
सजाया जिसे हर रात नैनो मे,
प्रातः होते ही जो मन मे छुपाया है“

तुम झुकी
सम्भाला अपना आँचल,
देखा मेरी और,
भर आँखो मे अनन्य भाव,
सोचा,
अब शायद  तुम उठाओगी
प्रेम पुष्प और लगा लोगी
अपने सीने से,
तुम दोगी हवा अपने आँचल की,
मन मे जलती प्रेम चिन्गारी को
बना दोगी ज्वाला, और फिर
कर दोगी शांत भर आलिंगन मे,


पर तुमने निष्ठुर बन,
रौंद डाला, मन की हर भावना को ,
मिटा दिया, संसार स्वप्न का,
तुमने उठाया नही उन पुष्पो को
बल्कि, साफ किया पैर की धूल को
और मुड कर चल दी,
न देखा एक बार भी पीछे पलटकर,
बस चलती रही चलती रही

Friday, October 15, 2010

यथार्थ से दूर

प्रिया  : यथार्थ  से दूर,
स्वप्न लोक से, तुम कभी मिलने आना,
छोड चिंता भविष्य  की
भूल कर वर्तमान का दुख
पाने को क्षण प्रेम के ,
प्रेम दीप बन जलने आना,
         साथ न तुम लाना अपने,
       असिमित साध्य, सिमित साधन,
       और पग पग कमी अर्थ  की,
       केवल प्रेम का धन लेकर,
       प्रेम व्यापार करने आना,
यथार्थ  मे आना छोड,
उसकी बाते उसके कष्ट
प्रतिपल पलता द्वेष  मन मे,
प्रेम क्यारी मे तुम प्रिय ,
प्रेम पुष्प  बन खिलने आना,
         भर लेना बाँहो मे मुझे,
        पवित्र मन से करना आलिंगन,
        मन मे उठी ज्वाला पर
        छिडक कर प्रेम का जल,
       जन्म जन्म की ये अगन बुझाना
छू लेना कोमल अधरो को,
अपने निष्पाप अधर से,
ध्यान रहे न टूटे सिमायें
प्रेम की मर्यादा  तक सिमित हो,
प्रेम मुझे वो करने आना,

प्रिय  :
 स्वप्न लोक मे नही अरे हम, यथार्थ मे ही जीते है,
 संभव नही यथार्थ मे वो, स्वप्न मे जो मधुरस पीते है
         प्रश्न  नही मधुर कल्पना का, नही स्वप्न लोक की ये बात,
        प्रिय आलिंगन करते जब भी, अधर फडकते सुलगते गात,
कोमल अंग बन मालती जब, वक्ष तरू से लिपटती है,
प्रंचड प्रेमाग्नि मे उस पल सोयी भावनाये पिघलती है
    उस पल धरे धर्य  कौन, जब चार अधर जुड जाते हों
   स्वभाविक है संयम खोना, जब हाथ कमर पर फिसल जाते हों
केवल कल्पना और स्वपन मे, ही सम्भव ऐसा हो पाता
मर्दायें  नही तोडती दम, जब प्रिय  बाँहो मे लहराता,
          किस मन न जागेगा काम, प्रिय  संग हो चाँदनी रात
         टूटे न सीमाये प्रेम की, ये है यथार्थ से दूर की बात

Wednesday, October 13, 2010

दंभ भरते हो जिस काया का

दंभ भरते हो जिस काया का
अभिमान कर जिसका इतराते हो
मुर्झायेगा ये सुमन एक दिन
जिस कारण मुझे ठुकराते हो
               प्रिय बन जो अब साथ लगे है
              कहते जिन्हे सदा तुम अपने
              मधुशाला  मे न मधु षेश रहेगा
              भूल जायेयें ज्यों बिसरते सपने
मिट जायेगी लाली कपोल की
श्वेत , काजल से ये केश  होंगे
दिखेगी रेखाये आयु की मुख पर
भिन्न अपने ये भेश  होंगे
             अंत होगी उमंगे मन की
            चक्षु सागर मे न होगा ज्योति जल
            चाह न रहेगी कुछ करने की
           शेष  रहेगा न तन मे बल
शेष रहेगा तो बस प्रेम मेरा
मन आयी तन चाह नही
सुगन्ध प्रेम की लेनी चाही
की पुष्प  रंग परवाह नही
           चाहा ना इस तरूण तनु को
           मिला अमरता का जिसे पन्थ नही
          चाहा मिलाना मन से मन को
          क्योकि मेरे प्रेम का अन्त नही

पर्वत की गोद से

पर्वत की गोद से ,
गिरा एक पत्थर,
जा मिला एक जलधारा मे,
सोचा यही है वो राह,
जो ले जाती है उस सागर तक,
जहाँ मिलेगें मोती प्रेम के,
छूपा लूंगा कुछ को सीने तले,
कुछ लगा लूंगा अपने मन से,


ये सोच, बह चला
उन धाराओं मे,
पाने उन मातियो को,
बहता रहा प्रबल वेग से,
बहुत दिनो तक,
सबसे अन्जान,
स्वयं से भी बेखर,


छोड़ दिया,
उसे धारा ने,
उस स्थान पर
जहाँ  बनता था
उस धारा का डेल्टा
सागर के ही किनारे,

मन मे आया
कहाँ  जाती है ये जल धारा
मुझे यहाँ  छोडकर ?
मुझे तो सागर तक जाना था
जिसके लिए जल धारा लायी थी
क्यों छोडे जा रही है किनारे पर,

देखा स्वयं को,
अब न था
वो vishal    पत्थर,
हो के रह गया था बस
एक रेत का कण

ये आखिरी कविता है

ये आखिरी कविता है, चरणो में तुम्हारे अर्पित ,

कर चुका मैं अपना, सब कुछ तुमको समर्पित,
                       तुम्हे बसा कर मन मन्दिर,
                       मैने अब तक पूजा है,
                       तुम ही कहो सहारा,
                      अब तुम बिन मेरा दूजा है,
प्रेरणा मैने आरजू की,
तुमसे ही तो पायी है,
चाहत तुम्हारी ही तो,
मेरी नस नस में समायी है,
                      अब तक मिली मुझको,
                      तुमसे सिर्फ निराशा है,
                     फिर भी पाने को प्रेम ,
                     तुम्हारा बंधी मन में आशा है,
प्रिय तुम्हारा प्रेम ही , मेरे जीवन का सहारा है,
इस ‘दीपक’ की ज्योती तू, ही मेरी नाव का किनारा है,

तुम से लगा के दिल कही लगाया भी नही जाता

तुम से लगा के दिल कही लगाया भी नही जाता,

जो हो चूका औरो का उसे अपनाया भी नही जाता,
दुख ना करना देख कर चोट मेरे माथे की ,
जख्म ऐसा हैं दिल पे जो दिखाया भी नही जाता,
हिसाब देंगे क्या मेरी सर्द आंहो का वो,
उनसे तो ठीक से अभी मुस्काराया भी नही जाता,
देख कर मेरे गम रो न दे कोई ,
इस डर से फसाना दिल का सुनाया भी नही जाता,
लाख कोशिश की मगर वो न गया दिल से,
जिस्म का हिस्सा है निकाला भी नही जाता,
कैसे पाऊ निजाद अब उसकी यादो से मै,
यूँ मौहब्बत का दीपक बुझाया भी नही जाता,

हर आरजू को हम अपनी दबा के रखेगें

हर आरजू को हम अपनी दबा के रखेगें,

तेरी यादो को दिल मै छूपा के रखेगें,
मोल क्या है मौहब्बत का तुम जानते नही,
ख्वाब फिर भी आँखों मे तेरे सजा के रखेगें,
तुम हरगिज ना चलोगे साथ मेरे जानते हैं,
राह उल्फत की फिर भी तुमको दिखा के रखेगें,
लौट आने की तुम्हारे अभी आस है दिल मे,
इन्तजार मे तुम्हारे पलके बिछा के रखेगें,
हकीकत है ये एक दिन जान जायेगी जरूर,
हम मौत को घर अपना दिखा के रखेगें
वो आयेगे देखने को हमे यकीन है दीपक,
दोस्त मेरे चेहरे से कफन हटा के रखेगें ,

Monday, October 11, 2010

मेरा प्यार एक मंन्दिर हैं

मेरा प्यार एक मंन्दिर हैं, उसकी मूरत हो तुम,

कैसे मै तुम्ही  भूला दूँ, जीने की सूरत हो तुम,
फूल तुम्हारी बगिया में,
कोई दूजा ना खिलेगा,
ढूढ लेना दुनिया में,
प्यार मुझसा ना मिलेगा,
तोडा दिल उसके लिए,
जो अन्देखा अन्जाना हैं,
भूल गये मेरे दिल को,
तुम्हारा ही जो दिवाना हैं,
तुम्हे पाने को बेकरार, प्यार की शरूररत हो तुम,
कैसे मै तुम्हे भूला दूँ, जीने की सूरत हो तुम,
जाने क्यो दिल मेरा,
बार बार ये कहता हैं,
कर लो चाहे लाख जतन,
प्यार हो के रहता है,
सारे जहाँ को छोड के,
दिल ये तुम पे आया हैं,
जाने क्यो फिर भी तुमने,
प्यार मेरा ठुकराया हैं,
कोई नही तुमसा कँही, सबसे खूबसूरत हो तुम,
कैसे मै तुम्हे भूला दूँ, मेरे जीने की सूरत हो तुम,
जाने किसकी याद मे ,
मुझको भूलाये बैठे हो,
जाने किस बात पर तुम,
मुझसे इतना तुम ऐठे हो,
कभी कोई प्यार की बाते,
हमें भी तो सुनाओ यार,
कमी  भला क्या है मुझमें,
 कुछ  तो जरा बताओ यार,
यूँ ही नही चाहता तुमको,जीवन की जरूरत हो तुम,
कैसे मै तुमको भूला दूं , मेरे जीने की सूरत हो तुम,
बने तो भी कैसे ये प्रेम कहानी,

एक तरफ आग है  दूजी तरफ पानी,
दिल मे बस उन्ही की तम्मना लिए,
शायद यूँ ही कट जायेगी जवानी,
दब के रह जाते हैं दिल मे अरमान सारे,
हक नही के कर सके हम को नादानी,
चाह कर भी पास उनके जा सकते नही,
बन के रहती हैं वो मेरे सामने अन्जानी,
देखकर उन्हे जागती हैं भावनाये मन में,
जी करता हैं करे कोई प्यारी सी शैतानी,
करने को तो कुछ भी मुश्किल नही दीपक,
मगर ये मौहब्बत करने नही देती मनमानी,
कहा भी बहुत कुछ कहा भी नही,

बाकी कुछ कहने को अब रहा भी नही,
उसने ही ढुकराया इस दिल को ,
जिसके सिवा दिल ने कुछ चाहा भी नही,
इतनी सी कहानी हैं मेरी मुहब्बत की
जिससे कहा उसने कुछ सुना भी नही,
बेबसी उनकी है, मगर हमारी तो नही,
इस लिए हमने दिल को रोका भी नही,
बार बार कहते रहे वो दूर जाने को ,
वो चले भी गये हमने टोका भी नही,
किस्मत ने हमे ऐसे खेल हें दीखाये,

कुछ पल की खुशिया  फिर गम के साये,
लहरो ने आकर तोड डाला उनको,
साहिल पे थे जो हमने धरोंदे  बनाये,
शूल बन कर उनकी तस्वीर लगी है दिल में
कैसे निकाल दे कॅही जान  न निकल जाये,
हालत मेरी देखकर मुस्कुराते हें वो,
दर्द में जिनके हमने आंसू थे बहाये,
ख्वाबो में भी उनसे मुलाकात नही होती,
जब नींद नही आती तो ख्वाब कैसे आये,
टिम टिमा रहा है  तेरी मुहब्बत का ‘दीपक’,
इन्तजार में जाने कब तूफ़ान  आ जाये,
एक फूल चुन के लाया हूँ  मै दिल के गुलशन से,

पत्तिया इसकी मेरे प्यार की रंग हें मेरी धडकन के,
रस भरा इसमें जितना जितनी खूष्बू समाये,
उतनी खुशियाँ  जीवन में सनम आपके आ जाये,
चाहत है  यही आप सदा इसी तरहा खिले,
पल पल रहो में आपकी आशाओ के दीप जले,
ईद सा हो दिन आपका दिवाली सी रात,
मन ये  देता आपको दुआओ की सोगात,
हर कामना जीवन की हो जाये आपकी पुरी,
मेरी तरहा ना रहे अपकी कोई आरजू अधुरी,
वो मिले हर खुशी दिल आपका जिसपे मरता है
आपके लिए इतनी सी दुआ ये ‘दीपक’ करता है ,
कब तक प्यासी धरती से, अब और हम तरसगे,

जिन पर टिकी हुई हें आँखे  वो सावन कब बरसेगे,
कब मिलोगे तुम हमे कब पास मेरे आओगे,
कब बैठोगे संग मेरे कब मेरी प्यास बुझाओगी,
कितना और समझाऐ मन को दिलाशे हम देगे,
जिन पर टिकी हुई हैं  आँखे वो सावन कब बरसेगे,
तुमको देखा तुमको चाहा और नही कुछ चाहा है  ,
झाँक  के देखो इन आँखों में चेहरा एक समाया है ,
होठ खुले जब भी मेरे नाम तेरा ही बस लेगे,
जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,
कब देखोगे छूकर मन को अपने मन की धडकन से,
और कब तक अन्जान रहोगे मेरे दिल की तडपन से,
‘दीपक’जलाया तेरे प्यार का अब बुझने ना हम देगे,
जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,
हो तपता सुरज, या पीपल की छाव ,
जहर उगलता शहर , या लहराता गाँव
तुम रहना साथ मेरे,
हो चाहे लडी सुखो की, खुशियो का संसार,
लगे चाहे झडी दुखो की, दर्दो की बौछार  ,
तुम रहना साथ मेरे,
दिन निकले सम्रद्धि का,  या निर्धनता की रात,
हर कोई मेरे साथ हो, या छोड दे मेरा हाथ ,
तुम रहना साथ मेरे,
नाम जाने दुनिया मेरा, या रहूँ  अन्जान ,
सर झुकाये मेरे आगे, या करे अपमान,
 तुम रहना साथ मेरे,
मैने चाहा ना, गोरा बदन,
सुन्दर आँखे , चंचल चितवन,
मैने चाहा ना, तन इकहरा,
पतली कमर, लट का रंग सुनहरा,
मैने चाहा ना, वो दिखे परी,
अजन्ता की मूरत, ज्यो संगमर मरी,
मैने चाहा ना, नयन कटीले ,
मादकता छलकाते, वो होठ रसीले,
मैने चाहा ना, हिरनी सी चाल,
ना मख्खन सा रंग, ना गुलाबी गाल,
मैने चाहा ना,  कोई राजकुमारी,
फूलो सा बदन , कलियों  की क्यारी,

मैने चाहा,  दो मिठे बोल,
प्रेम बरसाये, वो लब खोले,
मैने चाहा, करे प्यारी बाते,
ईद सा दिन बिते, दिवाली सी रातें
मैने चाहा, वो मुझको चाहे,
बसे मेरे मन में, मुझे अपने मन बसाये,
मैने चाहा, एक प्रेम की मूरत,
स्नेह छलकाये आँखे हो भोली सी सूरत,
मैने चाहा, स्नेह मन बसाये,
प्यार करे परिवार से, मेरा संसार सॅवारे,
मैने चाहा, वो मुझको जाने,
में समझू उसको, वो मुझको माने,
मन हुआ बैचेन,

तुम्हे ही पाने को,
दखकर तुम्हे दिल की,
बढने लगी धडकन,
तुम नही जानती ,
तुमसे ऐसा क्या है ,
जो महका देता है
मन को जैसे मधुबन,
बढती ही जाती है
मन में नशा बनके,
दीवानगी कहो मेरी,
या कहो पागल पन,
एक एक भाव तुम्हारा,
भाने लगा है  मन को,
एक तो रूप निराला ,
उस पर भोला पन,
रख दो कदम अपने,
तो खिलने लगे फुलो सा,
चमकने लगे चाँद  सा,
मेरा घर  मेरा आँगन ,
ये कैसी भावना है ,

 है कैसी ये आस,
जगाता है प्रतिदिन मेरे,
मन में नया अहसास,
एक तेरे स्पर्श   ने,
 ये कैसी प्यास जगायी है ,
हजारो इच्छाओ ने,
मन में ली अंगडाई,
जाने किन सपनो में, मन ये खोने लगा ,
बंद करके पलको को, दीदार तेरा होने लगा,
बावरा सा हुआ में,
जाने क्या क्या चाहूँ  ,
कभी नाचने लग्गों मै
कभी जौर से गॅाऊ,
अमावस की काली रात में,
चाँद  को बुलाने लगा,
पतझड के मौसम को भी,
सावन मै  बताने लगा
कभी इच्छा हूई तारो को,
में धरती पर ले आऊँ
समेट कर उन सब को,
तेरी मांग  में सजाऊ,
कभी इच्छा हूई बादलो को,
काजल में तेरा बना दूं ,
रंग लेकर  के सारे,
आँचल  में तेरा सजा दूं ,
नित नई इच्छा एक,
अपने में रंग बदलती है ,
न जाने ये कौन सी,
भावना मन में पलती है
पहले तो न ऐसा कभी,
मेरे  मन में आया,
भावनाये ये जागी उस पल,
स्पर्श  तेरा जब पाया,
अब तो बहुत कठिन ,
इस मन को थामना है ,
तुमको पाने की जागी ,
ये कैसी भावना है ,
गीतो को मेरे तुम ,

होठो पर सजा लो,
थोडी देर को ही सही,
प्यार से गुनगुना लो,
तुम प्रेरणा हो में कवि,
हर शब्द में छूपी तेरी छवि,
तुम सामने रहो मै  लिखता रहूँ
सपने तुम्हारे सदा बुनता रहॅू,
प्यार का सिलसिला चलता रहें,
हर दिन गीत नया बनता रहें,
आने की खुशी कभी जाने का गम लिए,
रंग तेरे लिए बहुत पर कम लिए,
खत्म होगा कागज स्याही खत्म होगी,
फिर न तेरी तस्वीर पूरी होगी,
गीतो में तुम्हे उतारना चाहा है ,
हर रंगो से सवारना चाहा है ,
बिनती हें इतनी इन्हे दिल मे बसा लो,
थोडी देर को ही सही ,प्यार से गुनगुना लो,
लोग आते हें ओर चले जाते है

कुछ सुनते हें कुछ सुनाते है
बस जाता हें कोई आके ख्यालो में,
दीदार के किसी के धागे ही टूट जाते है
हर कोई छूले आसमान  ये जरूरी नही ,
  सपने सब के ही कब पूरे हो पाते है
लिख जाता हें कोई सितारो मे नाम अपना,
कुछ गुमनाम ही अॅधेरो में खो  जाते है,
धुतकार देती हें किसी को ये दूनिया ,
सभी किसी को गले से लगाते है,
क्या हें र्फक उनमे ओर मुझमें ‘दीपक’,
ये सितारे हैं  अपना खेल दिखाते है,
राहो में फूल यूं ही दिन रात खिलते है ,

नये नये चहेरे कदम कदम पे मिलते है
निकल जाते हें कुछ यादो से हमारी,
रात भर कुछ चेहरे ख्वाबो में मिलते है,
मुस्किल हें बहुत ये राहे जिन्दगी ,
आओ साथ मेरे हम कुछ दूर चलते है,
यूं  ही चलते रहना साथ मेरे इस सफर ,
देखने हें अब कितने रास्ते बदलते है,
एक पल खुशी हें तो एक पल आंसू ,
रोज ही सुख दुख के चाँद  सुरज निकलते है,
थामे रहना तुम हाथ मेरा सदा यूंही ,
गम नही जो दोस्त मेरे दुस्मन बनते है
जो पा जाते हें अपनी मुहब्बत यारो,
 राहो में उनकी खुशियो के दीपक जलते है,
ये प्रेम मन का,
तुम बिन जलाये किसे,
तुम सा कौन धरा पे,
प्रिय अपना बनाये किसे,
ये प्रेम मन का,
क्यो बात ना मेरी मानो,
तुमसे मिलने को हर पल,
क्यो ढुढता रहे बहाने,
ये प्रेम मन का,
क्यो तुम तक ही सिमित है ,
और किसी को जाने ना,
बस तुम से ही परिचित है
ये प्रेम मन का, तुम को ही बुलाता है
बताऊ कैसे हाल बुरा ,
ये मेरा कर जाता है
ये प्रेम मन का,
देखो ना दुनिया की रस्मे,
हर रीत से बढकर ,
मानता है  अपनी कसमे,
ये प्रेम मन का,
हमसे क्या नही कराता है
बोलो ना जो कभी ,
वो मिथ्या बोल बुलवाता है
ये प्रेम मन का,
अपना पराया जाने ना,
ना देखे कांटे  रहा के,
प्रिय देखे बिन माने ना,

ये प्रेम मन का,
देखे ना रूप ना रंग,
लगे दुध सा शाम तन,
सो सके काँटों  पे प्रिय के संग,

ये प्रेम मन का,
कभी हॅसता कभी रूलाता है ,
सुने  न हो दो बोल जिसने ,
उसे बडे ताने सुनवाता है,

ये प्रेम मन का,
जीवन पथ मोंड जाता है,
लाखो कष्ट रहे फिर भी,
अधरो पर मुस्कान है ,

ये प्रेम मन का,
 एक दीपक जलाये रहता है
कोई पूछे किस लिए ये सब,
वो आज आयेगे कहता है ,
मै   भॅवर तुम किनारा ,
फिर भी ,
तुमको पाने की,
समा जाने की,
कितनी ही चाहत,
मन में पलती है ,
जानता हूँ ,
तुम तारा हो में पतंगा,
देखता हूँ तुम में भी,
शमा की झलक,
तुम्हे पाने की,
खो जाने की,
आस मन में कर वट बदलती हें,
तुम दरिया में सहरा,
तुम्हे पाऊ पास जाऊ,
कैसे मगर कैसे ,
मै  फूल घने  जंगल का,
आती नही एक किरण जहाँ
देखता हूँ  एक बिंदू ,
चमकता हुआ,
घने  जंगल के ऊपर,
प्रकाश तुमहारा मुझ तक ,
कभी न पहुँच  पायेगा,
बस आस है ,
हर साँस है
कभी तो आखिर कभी तो,
होगा कुछ ऐसा,
कोई  किरण मुझ  तक ,
आ जायेगी,
मै पा जाऊगा तुम्हे ,
और तुम्हारे
निर्दोष,
निष्छल ,
निष्कपट,
प्रेम को,
जो जीवित है ,
बस मेरे मन में,
हर धडकन में,
हर सांस  में,
तुम्हारे ही,
पवित्र प्रेम  की,
आस का,
एक दीपक जलता है ,
मेरी कविता बाते तुम्हारी ,

गजल मेरी हें यादे तुम्हारी,
पल जो बीते वो गीत बन गये,
सीने से लगाया है ,
पलको में छुपाया है
होठो से चूमा है
रंगो से सजाया है ,
खत तेरे मन के मीत बन गये,

चेहरा तुम्हारा मन में बसाये,
तेरे प्रेम का दीप जलाये,
ढुढे तुम्हे ही ये पागल मन,
हर पल तुम्हे ही पास बुलाये,
सपने तेरे जीवन की रीत बन गये,

तितली जैसे बाग मे डोले ,
पंखुउी जैसे कोई फूल खोले,
तुम बसे ऐसे मन मे मेरे,
धीरे धीरे होले होले,
तुम ही मन की प्रीत बन गये,
कभी बताना चाहता हूँ , कभी छुपाना चाहता हूँ

में रोग ये तुम्हे भी लगाना चाहता हूँ
देखो तो तुम भी, मुझे प्यार करके,
मन हो जायेगा सोना, इस आग में जलके,
इस आग मे तुमे भी जलाना चाहता हूँ

कभी किसी दिल से दिल मिलाओ तो सही,
दोनो जहाँ  की खूशियां, मिल जायेगी यही,
ये खूशी तुम्हे भी दिलाना चाहता हूँ ,

यादो में कभी किसी की, तुम आंसू  तो बहाओ,
इस प्यार भरे गम को, सीने से तो लगाओ ,
इस गम से तुम्हे भी मिलाना चाहता हॅू,

हर खुशी हर गम , इस प्यार के फसाने में,
कभी हॅसी कभी आंसू इस इश्क के तराने में,
तराना ये तुम्हे भी सुनाना चाहता हॅू,

करने वाला प्यार कोई, जब हमको मिल जाता है ,
सूनापन   दिल का , मुस्करा कर खिल जाता है ,
फूल तेरे मन का भी खिलाना चाहता हूँ ,

मुहब्बत है  चीज क्या , अभी तुम को नही पता,
सुनी नही तुमने कभी , किसी दिल की सदा,
दिल चीर कर तुम्हे मै  दिखाना चाहता हूँ ,
कभी बताना चाहता हूँ , कभी छुपाना चाहता हूँ
आँखों  से जब वो प्यार कर गयी,

मेरी  जिन्दगी को बहार कर गयी,
पाक दामनी पे था नाज हमको,
मुहब्बत   का अपनी गुनाहगार कर गयी,
डसकी एक नजर पे लूटा दूं  जिन्दगी,
वेा तीर ए नजर दिल के पार कर गयी,
चाँद  भी न होगा खूबसूरत उससे,
चांदनी  को फीका वो मेरे यार कर गयी,
झूठी दुनिया है झूठी है सारी उल्फत,
फिर भी दिवाने पे वो ऐतबार  कर गयी,
रौशनी जिस कमरे में कर न सका दीपक ,
उस कमरे को रौशन उठा के नकाब कर गयी,
ना भूख लेगे ना प्यास लगे,

हर पल दिल में तेरी आस जगे,

ये कैसा सितम कर दिया खुदा ,
क्यो किया मुझको उससे जुदा,
था मेरा एक छोटा सा चमन ,
फूलो सा खिला था उसका बदन,
हर दम हर पल वो मेरे पास थी,
मेरे दिल में रही बनके अहसास थी,
ना आंसू यूं  कभी पीता था मै ,
उसे देखकर ही जीता था मै ,
हाथो में लेकर वो हाथ मेरा ,
कहती थी है ये जो साथ तेरा,
मै सारी उम्रर ना छोडूगी,
दे दूँगी  जान में रिश्ता  ना तोडूगी,
वो भूल गयी सारी कसमे,
वो तोड गयी वफा की रस्मे,
क्या रोग ये मैंने  पाल लिया,
क्यो मेरा ये उसने हाल किया,
क्यो चुप चाप खडा देखता रहा,
दिल की आग पर हाथ सेकता रहा,
क्यो तूने उसे यूं  जाने दिया ,
क्यो मुझे उसे ना पाने दिया,
आंसू  को मेरे सोख सकता था,
चाहत तो उसे तू रोक सकता था ,
कौन हें जो अब दिल बहलाये,
कौन हें अब मुझे पे मिटजाये,
मेरे  दर्दो की अब दवा नही ,
उसे ढूढू कहाँ  अब कहाँ  नही,
उसकी यादो के दीपक दिन रात जले,
ना भूख लगे ना प्यास लगे,
इस प्यार के जैसा दुनिया में गम नही ,

मिल जाये जो पल भर तो वो भी कम नही,
एक ठेस दिल में आँखों  में वे करारी लिए,
कभी न मिले में तुम कभी मिले हम नही,
कहॅी बहारे हॅसी की कॅही मुहब्बत का तराना,
बढकर इससे हसी इससे दुजा भरम नही,
सहारा हें तो बस उस एक खुदा का,
पाक दुनिया में कोई इस सा करम नही,
यही शिवाला  यही कलीशा दीवानो का,
कहते हें इसके जैसा कोई हरम नही,
पिघल  गया वो संग दिल एक नजर में दीपक,
मौत पर भी कभी जिसकी हुई आँख   नम नही,
आये थे जिन्दगी में जो बहारो की तरह ,

बस गये  आँखों में वो नजारो की तरह,
चला जा रहा था खीचता हुआ नाव  को ,
वो मजधार में मिले हमे किनारो की तरह,
इन आँखों   ने न देखा कुछ सिवा उन के ,
बस गये दिल में हमारे वो प्यारो की तरह,
वो मासूम कली लांघ  पाती भी कैसे ,
अड गयी दुनिया रहा में दीवारो की तरह,
रोका बहुत दिल ने उन्हे समझाया बहुत ,
छोड गये हमको वो बेसहारो की तरह,
कौशिश तो की बहुत रौशनी की दीपक,
कुछ किस्मत ही रही अपनी अन्धयारो की तरह,
उतारता रहूँ  कागज पे जज्बात अपने मन के,
यूं  ही मेरी आॅखो में तुम समाने रहो,
देखकर में तुमको गीत कोई बनाऊ,
तुम सदा यूं ही प्रिय मुस्काते रहो,
पीछे किये कदम रूक जायेगी धडकन,
पल प्रति पल मेरे पास तुम आते रहो,
कच्चे धागो से बंधा रिस्ता ये नाजुक ,
तुम हो साथ मेरे अहसास दिलाते रहो,
फूल कहॅू तुमको कभी गूलाबो की कली ,
प्यार की खुष्बू से ये घर  महकाते रहो ,
इस दिल को बस तुम्हारी ही प्यास है ,
होठो से इस यूं  ही तुम बरसाते रहो,
आजा मेरे मन के मीत ,

तोड के दुनिया की रीत,
बैठ सामने आँखों  के आगे,
छेड कोई प्यार का गीत,
मन की व्यथा जान  भी जाओ,
प्रेम मेरा पहचान भी जाओ,
समझो तो ये पीडा मन की ,
रूठो ना अब मान भी जांओ,
धरती अम्बर से मिलती कहाँ ,
चाँद  चकोर का कब होता मिलन,
रोके कौन  ये भावना मन की,
बन के जलती जो प्रेम  अगन,
मन को अपने समझाऊ कैसे,
तुम बिन चैन न पाता है
जीता है बस तुम्हे देख कर,
तुम पर ही जान लुटाता है ,
पल पल बैचेन ये मन मेरा ,
तुमको ही तो पुकारता है ,
कब आओगे तुम प्रिय ,
नित सपने नये सवांरता है ,
फसाना मुहब्बत का सुनाये किसे,

जख्म इस दिल का दिखाये किसे,
मुहब्बत   ही उनकी  जिन्दगी है  हमारी,
सिवा उनके चाँद  हम बताये किसे,
उनसे न की हमने उम्मीदे संगदिली ,
कौन है  वो संगदिल बताये किसे,
बातो में उन की जागती थी राते ,
कौन हें वो रात भर जगाये जिससे,
तोडा जो दिल मेरा कसूर नही उनका ,
शख्स हम नही वो दिल दे पायें जिसे ,
इंकार  कर दिया उसने ही आज दीपक ,
रखा था अपने मन में अब तक छूपाये जिसे,
और कब तक मुझे मुहब्बत को सजा देगा,

कब तक हर शख्स मुझको दगा देगा,
जलेगा दिल मेरा याद रखना तूभी,
कोई पंतगा मेरी आग का तेरी दुनिया जला देगा,
एक बददुआ बन गयी खुद जिन्दगी जिनकी ,
वो शख्स अब किसी को क्या दुआ देगा ,
कहते गुनाह जब मुहब्बत को दुनिया वाले,
फिर कब तक दिलो में तू ये गुनाह देगा,
आॅखो से तश्वीर पल भर को हटती नही कोई,
बन के आॅसू कोई गमं आॅखो को मिटा देगा,
उंगलिया मेरी मुहब्बत पर उठाने वालो को,
सजा दिल दुखाने की कब तू मेरे खुदा देगा,
जब से तू मेरे जीवन में आयी है  ,

अन्धेरे दिल में रौशनी सी छायी हमें,
लिखता था तन्हाई के जो किस्से अब तक,
उस दिल में तुने नई आरजू जगायी है,
भेजा तुमको खत एक दिया नही जवाब,
और कहे क्या मुहब्बत की रूसवाई है,
पूछता हूँ  आज फिर करती हो मुझसे प्यार
खामोश रही अब भी कहूगा तू हरजायी है,
हाँ  करना या ना ये मर्जी है  तुम्हारी,
तुम्हे ही चाहूँगा  जान जब तक समायी ,
तू करेगी हाँ  मान जाऊगा खुदा को,
हो जायेगा यंकी दूनिया में बची खुदाई है,
हर पन्ने में छिपी तेरी ही परछाई है,
तन्हा रहने की तो आदत हें हमे ,
काटने को जिन्दगी पास मेरे तन्हाई है,
आँखों  में सूरत लिऐ दिवाना ढूढे उसे,
दिल में तस्वीर  जिसकी ख्वाबो में देखा जिसे,
परियो की रानी कोई कहानी,
बहारो की मलका ख्वाब इस दिल का,
आँखों में काजल या उडता बादल,
दुनिया देखा नही कोई उसके जैसा तुझे,
आँखों में सूरत लिए........देखा जिसे,
जब भी वो मुस्काऐ रातो की नीदं चुराऐ,
हाय उसका शरमाना दिल करदे दिवाना,
बालो को झटके वो ऐसे भटके ना दिल ये कैसे,
कतिल हें एक एक अदा कैसे कतिल ना बोलू उसे,
दिल में तष्वीर जिसकी ख्वाबो में देखा जिसे,
फुलो की नाजुक कली खुश्बूओ में हें वो पली ,
डसकी चंचल सी बाते महकायेगी मेरी बाते,
एक दिन तो मुझको मिलेगी दुनिया ये दिल की खिलेगी,
आयेगी जब सामने वो बांहों  में भर लूं  उसे,
आँखों में तस्वीर  जिसकी ख्वाबो में देखा जिसे,
वो  जब सामने होती है
भूल जाता हूँ में खुद को,
छोड देता हूँ काम सारे,
बस देखता जाता हूँ  उनको ,
वो  जब सामने होती है
मचलते हें अरमान दिल के,
उसको पाने की दिल में चाहत ,
ख्वाब दिखते हें मंन्जिल के ,
वो  जब सामने होती है,
जाने क्यो मन ये होता है,
कॅही इंकार न कर दे वो,
दबी दबी सी आह  भरता है,
 वो जब सामने होती है,
मेरी जुबान  लडखडाती है,
जो कहना चाहता हूँ  कहती नही,
बाते इधर उधर की कह जाती हें,
 वो जब सामने होती है,
रूक जाती हें आती हूई याद ,
उसके दिखने से पहले बहुत ,
फिर आती जाने के बाद,
वो  जब सामने होती है,
मन में सवाल एक उठता है,
जब चाहती नही वो तुझे ,
फिर क्यो तू उसपे मरता है,
हम तो पी जायेगे प्याला भी जहर का,


वो हाथो से अपने पिलाये तो सही,

कूद जायेगे हम बहते हुए दरिया में,

वो कर के इसारा बताये तो सही,

बता दूॅगा दिल के सब जज्बात उनको,

पर सूॅकून से पास मेरे वो बैठ जाये तो सही,

रखा हें क्या शराब में हम पिना छोड देंगे ,

एक बार होठो से होठ मिलाये तो सही,

आ जायेगे पार करके दरिया भी आग का,

पास अपने हमे वो बुलाये तो सही ,

उन से शिकायत हें यही वो जवाब नही देते,

जवाब मेरे खत का वो भिजवाते तो सही,

बिछ जायेगा फूल बनके राहो में दीपक,

वो घर  मेरे आने का मन बनाये तो सही,
दुनिया की निती में क्या जानू ,


में तो प्रेम पुजारी हॅू,

मन की देवी तुमको मानू,

तुम्हारा प्रेम आभारी हूॅ,

रब को मानू फिर तुमको मानू,

ओर किसी को मानू ना,

प्रेम आराधना प्रेम ही पुजा,

और में कुछ जानू ना,

कौन जीता कौन हारा,

इससे मुझको लेना क्या,

किसने किससे किया क्या,

मुझको लेना देना क्या,

कौन मंन्त्री कौन संन्तरी ,

कौंन हें अभिनेता नेता कौन

किसकी सरकार कौन विपक्ष,

कौन हें लेता देता कौन ,

मुझको उनसे मतलब क्या ,

क्यो में उनकी हिस्टरी जानू,

प्रेम ही ईष्वर प्रेम ही जीवन,

प््रोम ही शक्ति प्रेम ही दूर्जन ,

प््रोम ही बगिया प्रेम ही फूल ,

प्ेा्रम ही कोमल प्रेम ही शूल ,

प्रेम ही सब कूछ हें दुनिया,

इससे बढकर कुछ न मानू,

तुम ही प्रिय तुम से ही प्यार,

होश तुम्ही तुम ही खूमार ,

जूस्तजू तुम्ही तुम ही आरजू ,

तुम ही जीवन तुम ही संसार,

तुम ही मन मंन्दिर में बसीहो ,

तुमको ही नित ध्यान करू,

प्रश्न कोई दुनिया का पुछे ,

पागल उस को जानू में,

तेरे सिवा करे बात किसी की,

मूर्ख उसको मानू में,

पुछे कोई मन में हें क्या ,

में कह दू सूरत तुम्हारी,

कहे कोई हें तू क्या दीपक , कह दूॅ में प्रेम पुजारी ,
बात क्या हें दिल में बोली तो सही,


गुम सुम से यूॅ ही बैठे न रहो,

राज अपने दिल का खोलो तो सही,

मेरे सवाल पर तुम कुछ तो कहो,

जवाब न दिया मेरे सवाल का,

नजरे भी मुझसे मिलाते नही,

सिला होगा क्या मेरे प्यार का ,

क्यो आखिर मुझको बताते नही,

वक्त कभी भी ठहरता नही,

खामोशी में इसे बीत जाने न दो

जवानी यूॅ ही ये कट न जाये कही,

नजरो से नजरे मिलाने तो दो,

धीरे धीरे ही तो दिल का राज खुलता हें,

ये प्यार हें खामोशी में पलता हें,
ये पागल दिल ,


क्यो तुम पर मरता हें,

क्यो तुम से प्यार करता हें,

रखता हें क्यो पाने की चाह,

हरपल भरता क्यो सर्द आह,

ये पागल दिल,

तेरे ही सपने सजाता हें,

सब कुछ तुम्हे ही बताता हें,

तुम्हे देखते क्यो भरता नही ,

और पर क्यो ये मरता नही,

ये पागल दिल,

जानता हें मुझसे प्यार नही करती ,

दोस्त के सिवा कुछ नही समझती ,

फिर भी ये मुझको तडपाता हें ,

पूछने को बार बार उकसाता हें,

ये पागल दिल ,

तुम्हे अपना बनाना चहाता हें

लगेना नजर पलको में छूपाना चहाता हें,

कहता हेै मुहब्बत रंग लायेगी,

आकर तू मेरी बाॅहो में समायेगी,

ये पागल दिल,

कभी कभी तो हद कर जाता हें,

दुल्हन सी तुम्हे ख्वाबो में सजाता हें ,

में कहता ये हो पायेगा नही,

दुल्हन मेरी बननातू चाहेगी नही,

ये पागल दिल,

कहता हें तू मान जायेगी ,

बन के दुल्हन मेरे द्यर आयेगी ,

में कहता क्यो सपनो में खांेता हें ,

वो कहता सपना ही सच होता हें,
कब तक रहोगी दूर मुझसे ,


कब तक नजरे चुराओगी,

दूर रह कर तुम मुझसे,

एक पल चैन न पाओगी,

कहाॅ तक अकेले चलोगे ,

जीवन राह हें बडी कठोर,

कैसे न तुम हमपे मरोगे,

हर मोड पे मिलेगा चित्तचोर,

जहाॅ देखोगे में ही दिखूगा,

कब तक न प्रेम जागेगा,

प्रेम की विनती जब करूगा ,

क्यो न मुझसे मन लगेगा ,

मन का क्या कहीॅ भी आजाता हें ,

जबरदस्ती न प्यार किसी का पाता हें,
पीर हद्रय की क्या होती हें,


इससे हें अभी तू अनजान ,

क्यो र्सुख आॅखे होती हेैं,

ये तू क्या जाने नादान,

ज्यो सुलगे लकडी गीली,

यूॅ मन मेरा जलता हें,

हो गयी सारी त्वचा पीली,

कैसा रोग ये पलता हें ,

सबने देख ये मेरा तन,

लगी खरोंच जहाॅ कोई नही,

किसने देखा विक्षप्त मन,

इच्छाये जहाॅ अभी सोई नही ,

कौन द्यावो पे मरहम धरता हें ,

जीवन हें उसका दीपक तो जलता हें,
ऐ काश ऐसी मेरी तकदीर होती ,


पास मेरे कोई तेरी तश्वीर होती,

चूमता में हर रोज चेहरे को तेरे ,

लमबी चाहे दुरियो की जकीर होती ,

लगाना कभी सीने से कभी शीशे में सजाना,

दिखाता कभी सबको कभी सबसे छुपाता ,

होता चेहरा वो सामने जो हें तस्व्वर में,

काश पुरी मेरे ख्वाबो की ताबीर ीोती ,

देखकर उसको में हरपल आॅहे भरता ,

तू ना सही तेरी तष्वीर से बाते करता ,

जकडे रहते तेरे होठ जिस कैद में ,

मेरे सुलगते होठो की वो जंजीर होती ,

कहते हें लोग दर से किसी को न खली भेजे ,

फेलाता हें झोली दीपक अपनी तष्वीर देदो,

पहली बार कुछ माॅगा हें तोडना न दिल मेरा,

न दी माॅगने से भी तू मुझसे बडी फकीर होगी,
वो आशिक भी कितने मजबूर होते है  ,
अपने महबुब से जो बहुत दूर होते है ,
कभी चूमते हें खत को कभी सीने से लगरते हें,
तन्हाई में याद करके जी भर के सोते हें,
हमको मिली जुदाई ये भी रहमत खुदा की ,
जिष्म बेशक हो दिल से दिल कब दूर होते हें ,
उनसे करना शिकवा क्या जो बेवफा हो गये,
जाने क्यू उसके लिऐ हम यू चूर होते हें ,
जोडा हें तूने या मैने रिस्ता ना तू समझ,
रिस्ते वही जुडते हें जो रब को मंजूर होतें हें ,
हसॅना कभी रोना कभी मिलना कभी जुदाई,
हॅस के लगा दिल से मुहब्बत कें दस्तूर होते हें ,
देखे बिना जिनको नही दिल को होता सॅकू ,
चेहरे वही दीपक क्यो आॅखो से दूर होते हें,
ऐ कलियो तुम खिल जाओ,

ऐ फूलो तुम मुस्काराओ ,
ऐ भॅवरो तुम गुन गुनओ,
महका दो ये सारा चमन,
आज आयेगे मेरे सनम,
बादलो तुम द्यिर द्यिर आओ,
खुष्बू हवा में द्युल जाओ,
सर में आज चिडिया गाओ,
तितलियो फूलो पे मडराओ ,
आओ बस तुम्हे मेरी कसम ,
आयेगे आज मेरे सनम,
 गुलाबो राहो मे बिछजाना,
कोयल कोई गीत गाना,
रूठे होगे तो उन्हे मनाना,
मोर उन्हे नाच दिखाना ,
उतार देना सफर की थकन ,
आयेगे आज मेरे सनम,
तडपे सूरज कहीॅ छूप जाना,
दुनिया बुलाये जो भी न आना,
नाजूक दिल कॅही डर न जाये ,
बादलो ना जोर से गडगडाना,
जरा धीरे से बिजली तू चमक,
आयेगें आज मेरे सनम,
शाम को न पडे दीप जलाना,
इतनी चाॅदनी चाॅद फैलाना ,
सबसे खूब सूरत बना देना उसे ,
सितारो आचल में सज जाना,
जितना स्वागत करो होगा उतना कम,
आयेगंें आज मेरे सनम,

Thursday, September 9, 2010

जिन्दा हूॅ अभी के साॅस बाकी हें ,


चलाये रखता हें धडकन वा अहसास बाकी हें,

नब्ज थमने लगी ,आॅखे खुली हे फिर भी ,

सबब ये हें आने की उसके आस बाकी हें,

बेवफा कहता उसे वो रिस्ता तोड जाती ,

मुहब्बत का मेरी अधूरा किस्सा छोड जाती ,

वो गयी हें करके वादा आऊगी एक दिन,

मेरे होठो पर अभी वो प्यास बाकी हें,

तडपा.तडपा के यूॅ मेरा वो इम्मितहान लेती हें,

जुदाई के खंजरो से वो मेरी जान लेती हें,

रूक गयी साॅसे बन्द हो गयी धडकन ,

दीदार को अब भी खुली आॅखे बाकी हेें,

ऐसे तो ना खत्म होगा किस्सा मेरे प्यार का,

कुछ जो सिला देगा मुझे खत मेरे इकरार का ,

दर पे अपने बैठा हॅू बरसो से इस लिए ,

आना अभी तो नाम मेरे जवाब बाकी हें,

जायेगा खत तेरा कट जायेगी तन्हाई ,

आया तो प्यार की होगी बडी रूसवाई ,

खत भेज दो या तोड दो दिल र्मजी तुम्हारी ,

तन्हाई में बात करने को तेरी याद काफी हेें,
फिर डाकिये ने आवाज लगायी,


सोचा मेने आज शायद चिटटी तेरी आयी,

आये तो खत कई नाम के मेरे,

भेजी हो जो तूने वो चिटटी पायी ,

धडकन बढ जाती इस दिल की ,

डाकिया जब आवाज लगाता हें,

हलका.हलका सा एक डर ,

तेरे दिल में बैठा जाता हें,

उस खत में लिखडाले ये ,

दिल के सब जज्बात ,

सच बताऊ इस डर से ,

सोया नही में सारी रात,

होगा क्या जवाब तेरा ,

मेरे प्यार के इजहार का ,

होगा खत वो नफरत भरा ,

या जिक्र होगा दकरार का,

इतने निदो के बाद शायद

तुमको मेरी याद आयी,

जवाब देना जाने से पहले ,

उस खत में मेरी लिखा था,

लिखा वही उस खत में मैने ,

जो तुझमे तुझे दिखा था,

जाने से पहले जवाब न आया ,

बुरा ना माना था मैने,

शायद भूल गयी होगी तुम ,

सबब यही बस जाना मैने

तेरी गलती को माफ किया ,

तुझसे प्यार में करता हूॅ,

अब खत का बेकरार मन से,

दिन रात इन्तजार में करता हूॅ,

फिर उसकी आवाज सुनकर ,

आॅख मेरी भर आयी ,

रोज गुजरता हुआ गली से,

मुझको आवाज सगाता हें,

अपने मोटे से गठठर से,

दो.चार खत दे जाता हें ,

वो चिटटी नही लाता हें ,

जो उससे में चाहता हॅू,

न पाकर तेरी चिटटी को

बस टूट के रह जाता हूॅ ,

बुरे.बुरे से उठने लगे ,

दिल में मेरे सवाल कई,

दूर जाकर मुझसे अब ,

शायद मुझको तू भूल गयी ,

भूल न जाना मुझको तू,

दिल रो.रो देता दुआई,
ऐ इश्क जरा ये तो बता,


तू र्दद हें या दर्दो की दवा,

दरिया पानी का या आग कोई,

तूफान हें तू या धीमी हवा,

बिन आग जलाये वो हें तू ,

चुप चाप बुलाये वो हें तू ,

मुस्कान लबो पे लाये तू ही ,

सारी रात रूलाये वो हेें तू ,

रातो की नींद चुराये तू ,

तिल तिल कर तडपाये तू,

गैर को अपना बना दिया ,

अपनो को गैर बनाये तू ,

जवाॅ दिलो की धडकन हें तू ,

प्यासे लबो की फरकनहें तू ,

रास्ते नाम के खोले तू ही ,

नाम के रास्तो की अडचन हेें तू,

तू ही तो हर दिल का सनम हें ,

बस तू ही तो सच्चा करम हें,

लाखो दुनिया में नाम तेरे,

तू क्या हें तू एक भरम हें

खुशी भी हें तू ही गम हें ,

भरी बज्म में आॅख नम हें ,

कहती हें दुनिया इष्क बुरा ,

तु जितना मिले लेकिन कम हें,
काट डाले उन जालिमो ने वो पेड भी सारे ,


जिन पेडो पे मैने तेरा नाम लिखा था,

ढूढ.ढूढ कर पाडे हे उन कागज के पन्नो को ,

जिन पन्नो पे तूने कोई पैगाम लिखा था,

हॅस रहे हें वो उस तहरीर को पढकर ,

जिस तहरीर में मुहब्बत ही ईनाम लिखा था,

तोड डाली हें द्यर की उस दीवार को भी ,

जिस दीवार पर मैने मेरी जान लिखा था,

ढूढने से भी न मिला आज वो कागज का टुकडा ,

जिस पन्ने पर तुझको हुष्न की शान लिखा था,

मिटा दी हर चीज उन जालिमो ने दीपक ,

जिस भी निशानी पे उसका नाम लिखा था,

दम हें तो चीर दो इस कलेजे को भी मेरे ,

इस पे अब भी लिखा हेें जो पहले नाम लिखा था,
उस जगहा को चूम कर होता हें सूॅेूकून,


तेरे दामन को जहाॅ चूमते थे कभी ,



उन खतो को देख निकल आते हें आॅसू ,

जिन खतो को पढकर झूमते थे कभी ,

उन आॅखो में खोने को तरसती हें आॅखे,

जिनकी गहराई में डूबते थे कभी ,



वे गलियां भी अब लगती हें अजनबी ,

सारा दिन जिनमें हम द्यूमते थे कभी ,



सावन के उन झूलो की टूटी पडी हें डोर,

जिन झूलो पे संग तेरे झूलते थे कभी ,

उस चेहरे का नूर ही गुम हो गया कही ,

अनारे नूर जिस पे हरपल फूटते थे कभी ,



उस बाग मे भी अब छा गयी पतझड,

जिस बाग मे हर शाम द्यूमने थे कभी ,





फूल वो मुर्झा गये अब सारे ,

तेरी साॅसो की छूअन से जो खिलते थे कभी ,

बे रंग हो रहे हें अब गुलिस्ताॅ सारे,

रंगो में तेरे ही जो ढलते थे जो कभी ,



रौशनी का दूर तक उनका नाता न रहा ,

जो .दीपक. तेरे आगोश में जलते थे कभी,
वैसे तो नजारा झील का बडा ही हसंी हें,


लेकिन तुझे लगता हें यहाॅ कुछ भी नही हें,

दिल कश हें बहुत यॅू तो खूबसूरत ये जगहा,

बदसूरत लग रही हें यहाॅं तेरी लमी हें,

बदल जाता मौसम ही यहाॅ का ,

ये वादियाॅ ही कुछ ओर होती ,

होता बहुत ही सुन्दर मंजर ,

अगर तू यहाॅ मेरे साथ होती,

हर तरफ जवाॅ मुहब्बत का गुल खिल रहा हें,

जहा पेड नजर ,पे्रमिका से प्रेमी मिल रहा हें,

द्यूम रहे हें सब हाथो में हाथ लेकर ,

न जाने क्यो देखकर इनहे ये दिल जल रहा हें,

वो देखो बेठ कश्ती पे दिवाने जा रहे हें,

नग्मा कोई मुहब्बत का मस्जाने गा रहे हें ,

खो जाना एक दुजे में वो चाहते हें शायद,

देखो एक दुजे से कैसे लिपटते जा रहे हें,

उधर उस किनारे पर वो जो हाथ हिला रहे हें,

चेहरे पे उसके देखो कैसा नूर छा रहा हें ,

वो लडकी जो आ रही हें महबूबा हे शायद ,

बुला कर उसे करीब सीने से लगा रहा हें,

हर तरफ यहाॅं प्रेमियो का जोडा नजर आता हें ,

हर द्यडी हर पल मन तुमको ही बुलाता हें,

द्युमते हम भी ऐसे ही तू साथ होती यदि,

बिना तेरे ये मन जैसे ही तू तडप सा जाता हें,

कश्ती में बैठकर बहुत दूर निकल जाते,

जहाॅ देखता न कोई सूनता न हमारी बाते,

तन्हाई में जा के करते कोइ्र शरारत प्यारी

रहता न होश लौटने का इस कदर खो जते ,

सोचा था यहाॅ आकर तेरी याद आयेगी ,

ये न पता था यादे तेरी ज्यादा सतायेगी ,

देख कर इन सब मिलते हुए पे्रमियो को,

ये आॅख मेरी ,यहाॅ इस कदर भर आयेगी,

तरसती हुई आॅखो को अब ओर न तरसाओ ,

पल भर के लिए ही सही एक बार तो आजाओ,

दिन रात तडपते हुए ,तुझको ही बुलाते हें,

मेरे इस दिल की सदा एक बार तो सुनजाओ,
दूर रह कर भी तू मेरे पास रहेगी,


उम्र भर इस दिल को तेरी प्यास रहेगी,

होगी न नजरो के सामने तो क्या हुआ,

मेरे दिल में तू बन के अहसास रहेगी,

ईष्वर ने हमे मिलाया करके एक बहाना,

दिल में मेरे लिखा प्यार का अफसाना,

अब उसी इ्र्रष्वर की मर्जी ये भी देखो

जुदा कर दिया हमे ,फिर करके नया बहाना,

दो चार बार मिला के मन मे जगाया प्यार ,

जीने का रहा न मरने का इतना हुआ बेकरार,

अचानक आयी आॅधी के अन्णेरा कर गयी

तू चली भी गयी मे कर भी न सका इजहार,

मेरे दिल में हें तेरे दिल में भी जगायेगा,

जो लगी हें दिल मे मेरे लगन तुझे भी लगायेगा,

जुदा करना ओर मिलाना काम हेें उस का

उसने किया हें जुदा ,हमे वो ही मिलायेगा,

अधूरा हमारा मिलन ये रह पायेगा कैसे ,

तुम्हारे बिना ,दीपक. जी पायेगा कैसे ,

बहुत बडा हें दिल उसका वो सबकी सुनता हें ,

उसी से माॅगू गा वो मना न कर पायेगा ,
रोयेगा तडपेगा ये दिल फरियाद करेगा,


धडकन रहेगी जब तक ेतुमको याद करेगा,

चाहेगा तुम्हे ही जब तक रहेगी साॅसे ,

तमन्ना न किसी और की तुम्हारे बाद करेगा,

तुमको समेटे बैठी हें जो मेरी आॅखे,

देखने को तुमको अब ये तरसा करेगी ,

बरसात हो या के ना कभी ,लेकिन,

यादो में तेरी हरपल ये बरसा करेगी,

मेरी साॅसे तेरी खुष्बू जिनमें घुलने लगी थी ,

अब वो तरसेगी तुम्हारी खुष्बू के लिए ,

उखडी.उखडी सी रहेगी बैचेन ये अब ,

बस एक बार मिलने की आरजू के लिए ,

आॅसू जिनको कर दिया था रूकसत ,

बिन बुलाये ही अब वो चले आयेगें ,

दुनिया मे किसी को शायद वो जानते नही,

इस लिए आकर मेरी आॅखो मे बस जायेगे ,
आज नही तो कल तुम चली जाओगी ,


जडपता हूआ मुझे तुम छोड जाओगी,

मेरे र्दद का तुम्हे होगा अहसास क्या,

तुम तो सारे रिस्ते ही तोड जाओगी,

जाओगी तुम में तुम्हे जाते हुए देखगा,

चाह कर भी न में तुम्हे रोक सकूॅगा ,

समझऊगा दिल को तू जायेगी वापस ,

प्यार तेरा आॅखो में अपनी छुपा के रखूगा ,

बिना तेरे ये जगहा सूनी सी लगेगी ,

कौन होगी जो अब मुझसे बाते करेगी ,

बैठे गी कौन अब कैंटिन मे मेरे साथ,

अब कौन किसी मोटी लडकी पे हॅसेगी,

जरा डाटने से मेरे अब कौन रूठ जायेगी,

कौन होगी जो बिना मनाये मान जायेगी,

अब कोैन बैठे गी लाईब्रेरी में साथ मेरे,

अब कौन मुझसे जी के प्रश्न पूछेगी ,

कौन अब मुझको नये गाने सुनायेगी ,

कौन अब मुझको प्यारी बाते सुनायेगी,

किसके लिए लिखुगा कविताये पढेगी कौन,

पागल कह के अब कौन मुझको चिडायेगी,

छोड कर यूॅ मुझको जा रही हें तू,

जाते.जाते भी मुझको रूला रही हें तू,

कहना चहाता हें आज तुमसे दीपक,

में तुमसे प्यार हूॅ दोस्त आई लव यॅू,
आजा रे आजा हरजायी ,


के दिल को तेरी याद आयी ,

इस सावन ने आग लगायी ,

चाॅदनी रातो ने तारो की बारातो ने ,

बागो के फूलो ने सावन के झुलो ने ,

गाॅव की गलियो ने महकती कलियो ने

मिल के ये आवाज लगायी ,

के दिल को तेरी याद आयी,

कोयल ने गाया हें ,तुमको बुलाया हें,

हवाये आती हें तुमको बुलाती हें,

दिल ये रोता हें आॅखे तरसती हें,

आॅसू देते हें दुआई ,

के दिल को तेरी याद आयी ,

जब भी हम मिलते थे फुल दिल के खिलते थे ,

आॅखो मे आॅखे थी बहकी सी साॅसे थी ,

उन्ही ख्वाब अपनो ने मीठे से सपनो से,

दिल में ये पीड जगायी ,

के दिल को तेरी याद आयी,
बंधे ये कच्चे धागे से जरा झटके से टूट गये,


हम सफर बनाया था जिन्हे ,वो राहो में छूट गये,

मान जाना एक कौशिश में आदत थी जिनकी,

किसी तरहा न माने ,हमसे वो ऐसै रूठ गये,

यॅॅू तो कुछ भी न पास मेरे लूटाने के लिए,

फिर भी जमाने वालो ने मेरा सब कुछ लूट गये ,

जिन्दा रहे किस ख्वाब की ताबीर के लिए,

जिस शख्स की जिन्दगी के सारे सपने टूट गये ,

रोया किसी की याद में इतना ,दीपक ,

आज इन आॅचाो के सारे आॅसू सूख गये,

तुम्हे तो जाना हें तुम जाओगी जरूर ,

मुझको जरा बताओ मेरी खता क्या हें,

मुझको रूलायेगी रात दिन तेरी यादें ,

तुम्हारे प्यार की इससे बडी सजा क्या हें,
जिन्दगी क्यो मुझे ऐसे तू तडपाती हें ,


बहारो से पहले फिजा चली आती हें,

खुद को समझाऊ कैसे लोट आयेगी तू,

रूठ कर मेरी दुनिया से चली जाती हें,

खुशियो की बहारे कभी आॅसूयो की कतारे ,

कुदरत क्यो मुझे ऐसे रंग दिखती हें,

पी जाना आॅसूओ को आदत हो गयी हें,

मेरे लिए क्यो तू अपने आॅसू बहाती हें,

होता मेरे बस में तो रोक लेता तुम्हे ,

बेबसी मेरी के तू यू छोड कर जाती हें,

दूर रहके भी तुम्हे न भूल पायेगा ,दीपक,

सुना हें जुदाई दिलो को करीब लाती हें,
मेरी नजरो मे तुम ,


दिल मे तेरा चेहरा,

होठो पे तेरी बाते ,

आॅखो में तेरा पहरा ,

ओ जाना मेरी जाना

ऐसी आयी जिन्दगी में,

मुझको बहार मिली हें,

मेरे दिल अरमानो की,

कलियाॅ नई खिली हें ,

देखे मेरी इन आॅखो ने,

दिल कश कई नजारे ,

पत्थर भी हो जायें कलिया,

जहाॅ पडे कदम तुम्हारे ,

ओ जाना ,मेरी जाना,

जो भी तुमको देखता हें ,

आहे वो भरता हें,

खुश होता हें, आॅखो पे,

अपनी नाज वो करता हें,

रात दिन फिर कोई कसक,

उसको तडपाती हें,

खो जाता हें चैन भी उसका,

नीदे उड जाती हें

ओ जाना मेरी जाना,
कैसे बताऊ तुम बिन कैसे वक्त बिता रहा हें ,


दिल रो रहा हें में फिर भी मुस्कुरा रहा हें ,



तम्हारे सिवा कौन हें , बात करू में जिससे ,

बैठा एक कौने में खुद से ही बतिया रहा हूूॅ,

कैसे बताऊ याद तुम्हारी कितना सता रही हें,

तुमसे हें मुझे प्यार कितना अहसार दिला रही हें,



एक दूर तुम्हारे जाने से सितम ये हुआ ,

रह रह के बाते तेरी मुझको रूला रही हें,

शायद तुम्हे भी याद मेरी आ रही होगी ,

हें यकी मुझे ये तुमको सता रही होगी ,



आॅखो में आॅसू नही तो मिलने की कसक जरूर ,

उड कर आ जाने की चाह दिल में जगा रही होगी,

मन तुम्हारा भी काम में न लग रहा होगा ,

बस मेरा ही चेहरा आॅखो में बस रहा होगा ,



सोच रही हागी ,कब वापस जाऊगी में,

देखने को मुझे मन तरस रहा होगा,

सोचता हें आते ही तेरे क्या करूगा में,

छलक आयेंगे आॅसू या हसूॅगा में,



कुछ भी अब मुझको चाहे कहना सनम,

बढ कर तेरा हाथ अब थाम लूॅगा में,
रोको न हाथ मेरा ,पैमाने को भरने दो,


अरसे से दबे हूए आॅसूओ को निकलने दो,

उसकी किस्मत में हें यही वो मिट कर रहेगा ,

शमा को मत बुझाओ ,परवाने को जलने दो ,

सामने होकर भी क्यो चुराते हो नजरे ,

आॅखो से दिल की चाहत दिल में उतरने दो,

किस्सा एक सुनाने को बेताब हें बहुत ये दिल,

बहार आज दिल से इस आग को निकलने दो ,

अब तक ये बिछे फूल राहे गुजर मे मेरी ,

तोहफे में जो मिले हें उन काॅटो पर चलने दो ,

चाहते हो अगर रोैशनी हो जाये दिलो में,

मुहब्बत की आग में आज ,दीपक को जलने दो,



कत्ल करे जिष्म का सजाये मौत मिलती हें,

उन दिल के कातिलो की सजा क्या होगी ,

दिखा कर ख्वाब मंजिलो का छोड जाते हें जो

रोकगी बढके रास्ता जो ,टुटे दिलो की सदा होगी,
जिन्दगी क्यो तू मुझको ऐसे तडपाती हें,


बहार आने से पहेले खिजा चली आती हें,

कुछ पल की खुशिया फिर आॅसुओ की कतारे ,

किस्मत क्यो मुझको ऐसे रंग दिखाती हें,

खुद को समझाऊगा कैसे लौअ आयेगी तू,

रूठ कर मेरी दूनिया से तू चली जाती हें ,

आॅसूओ को पी जाना मेरी आदत हो गयी हें,

मेरे लिऐ क्यो तू अपने मोती बहाती हें,

होता मेरे बस में तो रोक लेता तुमको ,

बेबसी हें मेरी तू मुझे छोड कर जाती हें ,

दूर रहके भी तम्हे न भूल पायेगा ,दीपक,

लोग कहते हें जुदाई दिलो को करीब लाती हें,

सौचता हूॅ रास्ता ये कैसे तेरे बिन कटेगा ,

आयेगा कब वो दिन फासला ये हटेगा ,

गम होता कोई और तो बाॅट लेता साथ यारो के,

ये तेरी मुहब्बत का गम तेरे ही बटेगा ,
बन गयी मेरे लिए तू पहली सी हें ,


समस्या यही मेरी अलबेली सी हें,

आॅखो में देखता हूॅ तो प्यार नजर आता हें,

ख्वाबो में था जो वो संसार नजर आता हें ,

लगता हें के तू भी मझसे प्यार करती हैं,

पर शायद तुझसे कहने से तुम डरती हें,

तेरी बातो से लगता हें मुझसे प्यार नही ,

कर पायी अब तक मुझपे तू एतबार नही ,

अपना तो समझती हे पर प्यार नही करती ,

बस दोस्त समझती हें मुझ पर नही मरती ,

मेरी तरहा तू भी अकेली सी हें,

बन गयी मेरे लिऐ तू पहेली सी हें,