Friday, May 4, 2012

मैल

पैसा तो  हाथ  का मैल  है  (पुरानी कहावत ) 

बड़े वी आई पी मैल  हो ?
दिखाई  ही  नहीं देते,
किस  हाथ  पर  कितने चढ़े हो 
पता भी नहीं लग पाता 

जो दिन रात पसीना बहाता है 
दो रोटी के चक्कर में 
नहा भी नहीं पाता है 
हाथ धोना तो दूर 
मुंह भी बस इक बार धुल पाता है 
उसके साथ क्या  पंगा है तुम्हारा ?
क्या चिढ है उसके हाथ से  
जो तुम दूर भागते हो 

वे जो महंगे हैंड वाश लगाते है 
बीस बार हाथ धोते है 
दो बार नहाते है 
मेहनत से वास्ता नहीं 
बस हराम की खाते है 
घोटाला करके 
सबके हिस्से का मैल 
अपनी मुठ्ठी में दबा जाते है 
उनसे तो गहरी दोस्ती है तुम्हारी ?

सच बताओ तुम मैल ही हो ?
या हमारे बुढ्ढे हमें पागल बना गए ?

Sunday, March 25, 2012

आप और हम

एक ही प्रभू की पूजा हम अगर करते नहीं
एक ही दरगाह पर सर आप भी रखते नहीं
           अपना सजदागाह  अगर देवी का स्थान  है
           आपके सजदो का मरकज भी तो कब्रिस्तान है
हम अपने देवताओ की गिनती अगर रखते नहीं
आप भी मुश्किल कुशाओ को तो गिन सकते नहीं
           जितने कंकर उतने शंकर ये अगर मशहूर है
           जितने मुर्दे उतने सजदे आपका  भी दस्तूर है
अपने देवी देवताओ को अगर है अख्त्यार
आपके वलियो की ताकत का नहीं कुछ शुमार
            वक्ते मुश्किल अपना नारा है "जय बजरंग बली "
           आपको देखा लगाते नारा "या हैदर अली"
लेता है अवतार प्रभू अपना जो इस  देश में
आपने समझा खुदा को मुस्तुफा के भेष में
            जिस तरह हम है बजाते मंदिरों में घंटियाँ
            तुर्बतों पर आपके देखा बजाते तालियाँ
हम भजन करते है गाकर देवताओ की खूबियाँ
कब्र पर गाते हो तुम भी झूम कर कव्वालियां
          हम चढाते है बुतों पर दूध या पानी की धार
          आपको देखा चढाते मुर्ग, चादर और हार
बुत की पूजा हम करे हम को मिले नारे सकर
तुम झुको कब्रों पर और तुमको मिले जन्नत में घर ?
          आप मुशरिक हम भी  मुशरिक मामला जब साफ़ है
          "जन्नती तुम " "दोजखी हम " ये कोई इंसाफ है ?
हम भी जन्नत में रहेंगे तुम अगर हो जन्नती
वर्ना दोजख में हमारे साथ होंगे आप भी 

( ये कविता मेरे दोस्त ने मुझे दी है ब्लॉग पर पोस्ट करने के लिए  )


Tuesday, January 17, 2012

स्मृति


स्मृति के पन्नो पर
चित्र एक अंकित  है,
कई रंगो से सजा
प्रेम तुम्हारा संचित है,


तरंगें उठती ज्यो गर्भ सागर से,
तोड देती तटो का सीना,
मन मे उठती भावनायें मेरे, 
भेद कर धर्य का सीना,


तुम मिले मुझको ज्यों 
प्यासी धरा को जल की धार,
निर्धन मन कुबेर हो गया
दिया मोती सा प्रेम अपार,


सुख के पल बुलबुले पानी के 
पल मे बनते फूट जाते,
सम्भाले रखा ह्रदय मे मैने
पल थे जो हंसते  गुदगुदाते 


छूट गया अब संग तुम्हारा 
टूट गया मिलन का त्तार,
मिट गयी गाढे प्रेम की रेखा
मिट सका न उभार,


सजकर नववधू सी 
वेदनायें चली आती हैं,
चूभती शूल सी मन को
 तेरी स्मृति कराती है,

Thursday, November 17, 2011

धूल

कितने ही रास्तो से,
आती आज भी उड कर धूल,
लग जाती मेरे सीने से,
स्मॄत हो आते 
वो क्षण,
जब चले थे उन पर 
थाम कर हाथ 
एक दूजे का,

पूछ्ता है वो पेड
पत्तियाँ हिलाकर,
छाँव मे जिसकी कटती थी
सारी दोपहरी,
" वो जो,
पोछँती थी चुनरी से अपनी,
तेरे माथे पे आयी बूंदों को,
कहाँ है"

ये फूल बसन्ती सरसो के,
कहते,
" जो हमे तोड कर भर मुठठी 
खिलखिलाकर,
तुम पर फेंकती और ताली बजाती,
वो कहाँ है"

क्या कहूँ क्या उत्तर दूँ,
उन सवालों का,
जो जला देते इस मन को,
और विवश करते है 
आँखो को बरसने के लिये