Monday, July 9, 2018

बाते यू ही बनाने से क्या फायदा

बाते यू ही बनाने से क्या फायदा
बुझे दीपक जलाने से क्या फायदा
मेरी राधा हुई रुक्मणी और की
अब बाँसुरी बजाने से क्या फायदा
सारे सच  तेरे है स्वीकार हमे
फिर सच को छुपाने से क्या फायदा
बात का असर  तुम पे तो होता नही
एक ही बात दोहराने से क्या फायदा
प्यार की तो कोई कद्र  ही नही
यू ही सबको जताने से क्या फायदा
ना कोई सवाल न कोई जवाब मिलता
नज़रे नज़रों से मिलाने से क्या फायदा
जिसको जरूरत नही रोशनी की "दीपक"
उसकी राहो में जल जाने से क्या फायदा

Monday, May 14, 2018

उखड़ती सांसो पर शरीर का कुछ उधार तो बाकी है

मेरे मन पर तेरे मन का कुछ अधिकार तो बाकी है
उखड़ती सांसो पर शरीर का कुछ उधार तो बाकी है
     जीवन के इस मोड़ पे जब मौसम पतझड़ का आया
      पीछे धूप जवानी की और आगे बुढ़ापे का साया
      जर्जर होती काया में फिर प्राण फूक दीये तुमने
      बरसो बन्द पड़े दर को तुमने धीरे से खटकाया
      मिटी सभी अभिलाषाएं, मन मे तेरा प्यार तो बाकी है
मेरे मन पर तेरे मन का कुछ अधिकार तो बाकी है
उखड़ती सांसो पर शरीर का कुछ उधार तो बाकी है
       उसी राह पर खड़ा हूँ जिस राह पर छोड़ गए थे तुम
       रस्मे निभाने को कसमे सारी तोड़ गए थे तुम
       वादा था हमराह बनने का थोड़ी दूर ही चल पाये
       जाने किस बात पे रुठे मुझसे मुँह मोड़ गए थे तुम
      बेचैन सी आंखों में अब भी तेरा इंतज़ार तो बाकी है
मेरे मन पर तेरे मन का कुछ अधिकार तो बाकी है
उखड़ती सांसो पर शरीर का कुछ उधार तो बाकी है

Friday, May 4, 2018

आदत हमेशा मुस्कुराने की

किस्से मोहब्बत के सबको सुनाने की
कोई रूठ भी जाये तो बार बार मनाने की
कितनी भी करो कोशिश न आयेंगे आंसू मेरे
मेरी बचपन से है आदत हमेशा मुस्कुराने की
बहुत सुंदर हो तुम इसी का गुरुर है तुमको
वजह और तो कोई नही मुझे ठुकराने की
कोई असर नही मेरी बातों का तुम पे होता
कोई तरकीब नही जग मे जागते को जगाने की
तेरे आने से खिल उठा था मेरा जीवन
अब तो  ऋतु रह गयी है बस मुरझाने की
निकलता दम तेरी बांहो में तो और बात होती
पड़ता नही फर्क वजह कुछ भी हो जान जाने की
आरज़ू दीपक के दिल की हवाये क्या जाने
उनको तो आदत है जलते चिरागो को बुझाने की

Wednesday, April 11, 2018

एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही

तेरा झूठ भी सच माना हमने करी दुनिया की परवाह नही
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही
मेरी आँखें याद में तेरी अब भी झर झर बरसे
तेरे दरस को यार मेरे मेरी अब भी आंखे तरसे
कोई कितना भी खोजे पर मिलेगी  मेरे प्रेम की थाह नही
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही
तुमसे मिलकर ये जाना तुम इस जीवन की डोर
तुमसे ही है सांझ मेरी औऱ तुमसे ही है भोर
तुझसे पहले खुली कभी किसी की खातिर मेरी बाँह नही
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही
सारी दुनिया झूठी लागे तू लागे एक सच्चा
तुझसे प्यारा और कोई ना, ना कोई तुझसे अच्छा
इस प्रेम से सच्चा ना मंदिर इससे सच्ची कोई दरगाह नही
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही
कितने भी हम दूर हो चाहे ना होती हो बात
तेरी याद से ही दिन निकले तेरी याद से हो रात
तेरी बांहो से हो अच्छी इस जग में ऐसी पनाह नही
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही
तेरे प्रेम में जलता दीपक लौ तेरे संग बांधी
कुछ भी हो जाये अब न बुझेगा चाहे आये कितनी आंधी
जिस पथ मुझे तू न मिले अब चुननी मुझे वो राह नहीं
एक तेरे सिवा जालिम दिल ने की किसी और की चाह नही