Saturday, October 16, 2010

उस दिन जब, तुम्हारे चरणो मे

उस दिन जब, तुम्हारे चरणो मे,

प्रेम पुष्प, आया अर्पित कर
धो दिये आँसुओं से पुष्पो को
देखकर सजल नेत्रो से,
डूब गयी तुम किसी सोच मे,
जाने कहाँ रह गयी खोकर,
हटा लिए, चरण पीछे फिर
उस क्षण, बंद हो गयी गति
हृदय की, और लहरे लहू की,
कितने कुविचार, खडे हो गये
घेर लिया मष्तिक को हर ओर से,
“ये पुष्प न तुम उठाओगी,
गिरा दोगी महल प्रेम का
विश्वास की नीव पर
श्रद्धा स्तम्भ पर, जो बनाया है,
कर दोगी चूर स्वप्न सलोना
सजाया जिसे हर रात नैनो मे,
प्रातः होते ही जो मन मे छुपाया है“

तुम झुकी
सम्भाला अपना आँचल,
देखा मेरी और,
भर आँखो मे अनन्य भाव,
सोचा,
अब शायद  तुम उठाओगी
प्रेम पुष्प और लगा लोगी
अपने सीने से,
तुम दोगी हवा अपने आँचल की,
मन मे जलती प्रेम चिन्गारी को
बना दोगी ज्वाला, और फिर
कर दोगी शांत भर आलिंगन मे,


पर तुमने निष्ठुर बन,
रौंद डाला, मन की हर भावना को ,
मिटा दिया, संसार स्वप्न का,
तुमने उठाया नही उन पुष्पो को
बल्कि, साफ किया पैर की धूल को
और मुड कर चल दी,
न देखा एक बार भी पीछे पलटकर,
बस चलती रही चलती रही

2 comments:

  1. कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

    विजयादशमी की बधाई एवं शुभकामनाएं

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  2. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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