Saturday, October 30, 2010

आज खुद पे यूँ ना शर्माया होता

आज खुद पे यूँ ना शर्माया होता
किसी का दिल जो तुने ना दुखाया होता
लौट जाने दिया उसे खाली हाथ दर से
कम से कम पानी तो पिलाया होता
चाहता तो बचा भी सकता था उसको
अपने हिस्से का निवाला उसे खिलाया होता
तेरा राज भी यूँ चर्चा ए आम न होता
किसी का राज जो तूने छूपाया होता
सरे बाजार ना लुटती इज्जत घर की
किसी बहन के काँधे  से आँचल जो ना हटाया होता
रौशनी रहती तेरे घर मे भी आज रात
किसी घर का दीपक जो ना बुझाया होता

8 comments:

  1. बहुत खूबसूरत और संदेशो से परिपूर्ण रचना... बधाई...

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  2. शब्दों में बयां करना मुश्किल है यह सब. आपने प्रयास किया फिर भी.

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  3. bilkul sahi baat kahi aapne kavita ke madhyam se

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  4. 4.5/10

    बहुत सुन्दर भाव ....सुन्दर प्रयास

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  5. @ Pooja
    @ संजय भास्कर
    @ भारतीय नागरिक
    @ वंदना
    हौसंला अफजाई के लिए धन्यवाद

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  6. @ उस्ताद जी
    नम्बर बढाने के लिए धन्यवाद,
    थोडा मार्गदर्शन भी करते रहिए

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  7. बहुत खूब दीपक, आत्मावलोकन करवाती रचना है, बधाई दिल से।

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