Sunday, March 25, 2012
आप और हम
एक ही प्रभू की पूजा हम अगर करते नहीं
( ये कविता मेरे दोस्त ने मुझे दी है ब्लॉग पर पोस्ट करने के लिए )Tuesday, January 17, 2012
स्मृति
स्मृति के पन्नो पर
चित्र एक अंकित है,
कई रंगो से सजा
प्रेम तुम्हारा संचित है,
तरंगें उठती ज्यो गर्भ सागर से,
तोड देती तटो का सीना,
मन मे उठती भावनायें मेरे,
भेद कर धर्य का सीना,
तुम मिले मुझको ज्यों
प्यासी धरा को जल की धार,
निर्धन मन कुबेर हो गया
दिया मोती सा प्रेम अपार,
सुख के पल बुलबुले पानी के
पल मे बनते फूट जाते,
सम्भाले रखा ह्रदय मे मैने
पल थे जो हंसते गुदगुदाते
छूट गया अब संग तुम्हारा
टूट गया मिलन का त्तार,
मिट गयी गाढे प्रेम की रेखा
मिट सका न उभार,
सजकर नववधू सी
वेदनायें चली आती हैं,
चूभती शूल सी मन को
तेरी स्मृति कराती है,
Thursday, November 17, 2011
धूल
कितने ही रास्तो से,
आती आज भी उड कर धूल,
लग जाती मेरे सीने से,
स्मॄत हो आते
वो क्षण,
जब चले थे उन पर
थाम कर हाथ
एक दूजे का,
पूछ्ता है वो पेड
पत्तियाँ हिलाकर,
छाँव मे जिसकी कटती थी
सारी दोपहरी,
" वो जो,
पोछँती थी चुनरी से अपनी,
तेरे माथे पे आयी बूंदों को,
कहाँ है"
ये फूल बसन्ती सरसो के,
कहते,
" जो हमे तोड कर भर मुठठी
खिलखिलाकर,
तुम पर फेंकती और ताली बजाती,
वो कहाँ है"
क्या कहूँ क्या उत्तर दूँ,
उन सवालों का,
जो जला देते इस मन को,
और विवश करते है
आँखो को बरसने के लिये
आती आज भी उड कर धूल,
लग जाती मेरे सीने से,
स्मॄत हो आते
वो क्षण,
जब चले थे उन पर
थाम कर हाथ
एक दूजे का,
पूछ्ता है वो पेड
पत्तियाँ हिलाकर,
छाँव मे जिसकी कटती थी
सारी दोपहरी,
" वो जो,
पोछँती थी चुनरी से अपनी,
तेरे माथे पे आयी बूंदों को,
कहाँ है"
ये फूल बसन्ती सरसो के,
कहते,
" जो हमे तोड कर भर मुठठी
खिलखिलाकर,
तुम पर फेंकती और ताली बजाती,
वो कहाँ है"
क्या कहूँ क्या उत्तर दूँ,
उन सवालों का,
जो जला देते इस मन को,
और विवश करते है
आँखो को बरसने के लिये
Monday, November 7, 2011
अनाड़ी
बहुत दिनों से ब्लाग से दूर हूँ , कारण मैं क्या बताऊ शायद ये कविता कुछ बता दे
दो बैलो की गाड़ी
दोनों ही अनाड़ी
एक खीचे पूरब की ओर
दूजा पच्छिम को लगाये जोर
समझ दोनों की अलग
फिर भी बंधी दोनों की डोर
एक बिना हरे के भूखा
एक को सब्र देता है भूसा
एक नांद से दोनों बंधे है
खाने को मिले जो रूखा सूखा
साथ है रहना, दोनो ही जाने
फिर भी दूजे की बात न माने
बिना बात तकरार करे वो
पागल भये, वो हुए दीवाने
प्रेम दोनों तरफ पलता है
तभी तो पहिया सही चलता है
कदम लडखडाते है जब एक के
तो दूजा एकदम संभालता है
यूं ही चलते चलते
हो जायेंगे खिलाडी
दो बैलो की गाड़ी
दोनों ही अनाड़ी
दो बैलो की गाड़ी
दोनों ही अनाड़ी
एक खीचे पूरब की ओर
दूजा पच्छिम को लगाये जोर
समझ दोनों की अलग
फिर भी बंधी दोनों की डोर
एक बिना हरे के भूखा
एक को सब्र देता है भूसा
एक नांद से दोनों बंधे है
खाने को मिले जो रूखा सूखा
साथ है रहना, दोनो ही जाने
फिर भी दूजे की बात न माने
बिना बात तकरार करे वो
पागल भये, वो हुए दीवाने
प्रेम दोनों तरफ पलता है
तभी तो पहिया सही चलता है
कदम लडखडाते है जब एक के
तो दूजा एकदम संभालता है
यूं ही चलते चलते
हो जायेंगे खिलाडी
दो बैलो की गाड़ी
दोनों ही अनाड़ी
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