Sunday, December 10, 2017

हाथो में पहली बार जब उसका हाथ आया था

हाथो में पहली बार जब उसका हाथ आया था
हजारो ख्वाहिशो को अपने साथ पाया था
क्या होगा कल को ये किसने सोचा था
हमने तो अपना बस भाग्य आजमाया था
ये प्यार की राहे है कोई खेल नही दिलबर
वो ही सेक सकता है जिसने घर जलाया था
फैला दी बांहे उसके लिए आसमानो ने
उस नन्हे से परिंदे ने जब पर फैलाया था
क्या बात थी दिल मे क्या चाँद से वादा था
ठिठुरती ठंड में भी घर से क्यो चकोर आया था
कोशिश जलने की मरते दम तक कर "दीपक"
थोड़ा ही सही फिर भी अंधेरा तुमने भी मिटाया था

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-12-2017) को जानवर पैदा कर ; चर्चामंच 2815 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ख़ूब ... अँधेरा मिटाने की एक कोशिश भी काफ़ी है आक के समय में जहाँ किसी को फ़ुर्सत ही नहीं है ...

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  3. बहुत खुबसूरत लिखा है आपने।

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