Monday, February 5, 2018

ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी


जाने कैसी ये अपनी तकदीर थी
ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी
       तुझको मतलब था अपना मुझे अपना था
       था अलग लेकिन हम दोनो का सपना था
       तेरा दुख अलग था मेरी अलग पीर थी
       ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी
तेरी मंजिल अलग थी मेरी ओर थी
कुछ पल को बंधी अपनी डोर थी
बड़ी प्यारी मगर उन पलों की तस्वीर थी
ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी
       मैं रुक सकता था पर तुझे जाना था
       अपने सपनो को पूरा तुझे कर आना था
       प्रेम की राहों में यही जंजीर थी
      ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी
तुझको जाते हुये ना मैंने टोका था
मुझको जाते हुये ना तूने रोका था
सुईया वक्त की थी या फिर तीर थी
ना तो मैं रांझा था न तू ही हीर थी




1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-02-2017) को "साहित्यकार समागम एवं पुस्तक विमोचन"; चर्चामंच 2872 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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