Friday, June 10, 2011

कब तक प्यासी धरती से


लगभग १५ दिन से बिजली व् नेट की प्रोब्लम के कारण आप सब से न जुड पाने के लिए क्षमा के साथ एक पुरानी रचना प्रस्तुत है 

कब तक प्यासी धरती से, अब और हम तरसगे,
जिन पर टिकी हुई हें आँखे  वो सावन कब बरसेगे,
कब मिलोगे तुम हमे कब पास मेरे आओगे,
कब बैठोगे संग मेरे कब मेरी प्यास बुझाओगी,
कितना और समझाऐ मन को कितने दिलाशे हम देगे,
जिन पर टिकी हुई हैं  आँखे वो सावन कब बरसेगे,
तुमको देखा तुमको चाहा और नही कुछ चाहा है  ,
झाँक  के देखो इन आँखों में चेहरा एक समाया है ,
होठ खुले जब भी मेरे नाम तेरा ही बस लेगे,
जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,
कब देखोगे छूकर मन को अपने मन की धडकन से,
और कब तक अन्जान रहोगे मेरे दिल की तडपन से,
‘दीपक’जलाया तेरे प्यार का अब बुझने ना हम देगे,
जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,

23 comments:

  1. बहुत सुंदर

    "कब देखोगे छूकर मन को अपने मन की धडकन से,
    और कब तक अन्जान रहोगे मेरे दिल की तडपन से"

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  2. सावन को आने दो:)

    गरम माहौल में ऐसी नरम पुकार ठंडक ले आई।

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  3. ‘दीपक’जलाया तेरे प्यार का अब बुझने ना हम देगे,
    जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,


    बहुत बढ़िया.

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  4. कोई बात नही दीपक भाई। कभी कभी कुछ बातें ऐसी हो जाती है जो हमारे वश में नही रहती है। वापसी के लिए मुबारकबाद।

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  5. जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेंगे
    अच्छी लगी कविता.

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  6. Bahut lajawaab ... dono savan ki intezaar hai ab to ... barkha aur unke aane ki ... khoobsoorat ...

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  7. बहुत सुंदर लगी कविता|

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  8. अच्छा लगा पढ़ कर ......

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  9. अपने भावो को बहुत सुंदरता से तराश कर अमूल्य रचना का रूप दिया है.

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  10. कुछ व्यक्तिगत कारणों से पिछले 15 दिनों से ब्लॉग से दूर था
    इसी कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका !

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  11. deepak ji
    bahut bahut hi achhi lagi aapki rachna
    virah vedna ki sashakt jhalak milti hai aapki kavita me
    कब देखोगे छूकर मन को अपने मन की धडकन से,
    और कब तक अन्जान रहोगे मेरे दिल की तडपन से,
    ‘दीपक’जलाया तेरे प्यार का अब बुझने ना हम देगे,
    जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे,
    bahut khoob--------
    poonam

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  12. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति.

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  13. बहुत सुन्दर रचना

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  14. तुमको देखा तुमको चाहा और नही कुछ चाहा है ,
    झाँक के देखो इन आँखों में चेहरा एक समाया है ,
    होठ खुले जब भी मेरे नाम तेरा ही बस लेगे,
    जिन पर टिकी हुई है आँखे वो सावन कब बरसेगे...
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! इस शानदार और लाजवाब रचना के लिए बधाई!

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  15. punah swagat hai aapka...achchi rachna.

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  16. वाह!!!!लाजवाब विरह और प्रेम की अभिव्यक्ति

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  17. मन के भावों का प्रतिबिबंन जस का तस .

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  18. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  19. प्रेम में बेचैनी द्रष्टव्य .......
    विरह वेदना के व्याकुल भावों की सुन्दर रचना

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  20. Bahut sunder bhai...
    har line me gajab ki wedna hai.

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