Tuesday, February 8, 2011

मेरी धरती मेरी माँ

तेरा सीना चीरते चीरते
पुरखे मेरे र्स्वग सिधारे
तू थकी ना अन्न देती देती
ना वे हल चलाते हारे
                  बचपन मेरा सना रहा तुझमे
                  तुझमे यौवन ने ली अंगडाई
                  तू थी, तो बसा घर मेरा
                  तुझ से ही अंगीठी जल पायी
कैसे जाने दूँ यूँ ही तुझको
तू “सरकार“ को भा गयी
कैसे करने दूँ अधिग्रहण उसे
वो डायन कितनो को खा गयी
                   मै बेटा हूँ किसान का
                   माँ हमारी है ये धरती
                  “सरकार“ बदल लो अपना इरादा
                   क्यो किसान से है पंगा करती
है क्या पास सिवाय धरते के
जिसके सहारे मै रहूँगा
(सुनो “सरकार“) मार दूंगा या मर जाऊँगा
पर माँ पर आंच ना आने दूंगा

30 comments:

  1. सराहनीय रचना।
    प्रभावकारी लेखन के लिए बधाई।
    =====================
    कृपया पर इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
    ==============================
    गाँव-गाँव घर-घ्रर मिलें, दो ही प्रमुख हकीम।
    आँगन मिस तुलसी मिलें, बाहर मिस्टर नीम॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  2. बहुत खूब...सरकार को सुनना ही होगा...

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  3. सुंदर एवं प्रभावशाली रचना। शुभकामनाएॅ।

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  4. दीपक जी!इस प्रेम का कोई मोल नहीं जिसे वो कौड़ियों के मोल नीलाम कर रहे हैं!!

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  5. सरकार से क्या कह रहे है हमारे कृषि मंत्री कह रहे है की वो तो किसानो के लिए सब कुछ कर रहे है पार पता नहीं क्यों किसान आत्महत्याए कर रहे है |

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  6. बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति.
    ढेरों बसंतई सलाम.

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  7. deepak ji bahut hi acche sabdo me aapne
    dharti ma ki pukar ko blog tak pahuchaya
    sarkaar ko bhi manana padega
    thanks bhai ji

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  8. बचपन मेरा सना रहा तुझमे
    तुझमे यौवन ने ली अंगडाई
    तू थी, तो बसा घर मेरा
    तुझ से ही अंगीठी जल पायी
    भावों का सटीक प्रस्तुतीकरण...
    प्रभावशाली रचना.

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  9. दर्द समझ आता है, लेकिन दोस्त हालात अच्छे नहीं हैं। जब एक एक बीघा के लिये 7\8 फ़िगर की कीमत लगेगी तो बहुत सों की भावनायें बदल जाती हैं, बहुत नजदीक से देखे हैं ऐसे सीन।
    ये अच्छा लगा कि इस उम्र में धरती के बारे में ऐसे विचार हैं।
    बसंत पंचमी की शुभकामनायें।

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  10. @ दीपक सैनी जी..
    नमस्कार !
    सराहनीय रचना।
    बेहद प्रभावकारी लेखन के लिए बधाई।

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  11. वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

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  12. माटी कहे पुकार के...क्या बात है....मिट्टी की व्यथा...सही लिखा..

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  13. (सुनो “सरकार“) मार दूंगा या मर जाऊँगा
    पर माँ पर आंच ना आने दूंगा ...

    Beautiful expression !

    .

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  14. @ डॉ0 डंडा लखनवी
    दोहे अच्छा लगा जी

    @ तारकेश्वर गिरी जी
    पधारने के लिए धन्यवाद

    @ शेखर सुमन
    सुनना तो पडेगा भाई

    @ एहसास (अमित भाई)
    धन्यवाद

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  15. @ सम्वेदना के स्वर जी
    सर जी, कौडियो का मुआवजा दे कर करोडो मे बेच रही है

    @ अंशुमाला ली
    ये मंत्री कुछ करते तो आत्महत्या की नौबत ही नही आती

    @ सुशील बाकलीवाल जी
    धन्यवाद

    @ सगेबोब जी
    आपको भी बसंतई सलाम

    @ ओम कश्यप भाई
    धन्यवाद

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  16. @ शिखा जी
    धन्यवाद

    @ सजय@मो सम कौन ?
    भाई साहब बात तो आपकी भी ठीक है पर शायद सब के साथ ऐसा है क्योकि जिस दिन से हमारी जमीन के अधिग्रहण के बात पता लगी है मेरे ताऊ जी की तबियत मे बहुत गिरावट आ चुकी है और पिता जी भी काफी परेशान है

    @ संजय भास्कर
    संजय भाई धन्यवाद, आपको भी बसंत की शुभकामनाये

    @ राजेन्द्र कुमार नचिकेता जी
    धन्यवाद

    @ झील जी
    धन्यवाद

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  17. बिलकुल किसान की सादगी के साथ सीधी बात रखी है। अच्छी कविता।

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  18. तेवर अच्छा है और रचना भी. माटी की बात बहुत कुछ कहती है और माटी सभी की कहानी कहती है.

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  19. सुंदर एवं प्रभावशाली रचना। शुभकामनाए|

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  20. 'मैं बेटा हूँ किसान का
    माँ हमारी है ये धरती '
    धरती माँ को समर्पित बहुत ही संकल्प वद्ध रचना

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  21. कि‍सान तो वैसे ही सब्र की मि‍साल होता है, उसका मार डालना या मि‍ट जाना, समझ नहीं आता।

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  22. किसान की ओर से पर सुन्दर और भावपूर्ण कविता । बधाई।

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  23. धरती माँ के प्रति आपका प्रेम प्रणम्य है.

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  24. माँ के बच्चे की सच्ची आवाज़...
    बहुत अच्छी रचना...

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  25. @ दिनेशराय द्विवेदी जी
    आप पहली बार आये है स्वागत है , धन्यवाद

    @ भूषण जी
    जब जान पे बन आती है तेवर तो बदल ही जाते है
    धन्यवाद

    @ पटाली जी
    धन्यवाद

    @ सुरेन्द्र सिंह जी
    धन्यवाद

    @ राजीव शा जी
    जब आपकी जमीन पर सरकार द्वारा अधिग्रहण तो अपने आप समझ
    आ जायेगा जी, आप पहली बार आये है स्वागत है आपका आते
    रहीयेगा

    @ डा0 (मिस) शरद सिंह जी
    आप पहली बार आये है स्वागत है

    @ जाकिर अली रजनीश जी
    धन्यवाद

    @ कुवँर कुसुमेश जी
    एक किसान को अपनी धरती माँ से प्रेम नही होगा तो किस से होगा
    धन्यवाद

    @ पूजा जी
    धन्यवाद

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  26. बहुत समर्पित भावों का संगम ।

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